Sanskrit Class 9 Chapter 2 Question Answer सुखस्य मूलं धर्मःधर्मस्य मूलं अर्थः
इस लेख में हम Sanskrit Class 9 Chapter 2 Question Answer सुखस्य मूलं धर्मःधर्मस्य मूलं अर्थः के सभी प्रश्न-उत्तर सरल हिन्दी अर्थ सहित पढ़ेंगे। यहाँ एकपदेन उत्तर, पूर्णवाक्येन उत्तर, प्रश्न निर्माण, रिक्तस्थान पूर्ति तथा बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। यह सामग्री परीक्षा की तैयारी तथा पुनरावृत्ति के लिए अत्यंत उपयोगी है।
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
1..एकपदेन उत्तरं लिखत –
(एक शब्द में उत्तर लिखो)
(क) वास्तविकसुखस्य आधारः कः ?
(वास्तविक सुख का आधार क्या है?)
उत्तर…वास्तविकसुखस्य आधारः धर्मःअस्ति।
(वास्तविक सुख का आधार धर्म है)
(ख) कस्य अभावात् स्वकर्तव्यपालनं कठिनं भवति ?
(किसके अभाव में अपने कर्तव्य का पालन कठिन हो जाता है?)
उत्तर..धनस्य अभावात् स्वकर्तव्यपालनं कठिनं भवति।
(धन के अभाव में)
(ग) स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः कतिविधः भवति ?
(स्वस्थ आर्थिक व्यवहार कितने प्रकार का होता है?)
उत्तर…स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः त्रिविधः भवति।
(स्वस्थ आर्थिक व्यवहार तीन प्रकार का होता है)
(घ) कीदृशः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः ?
(कैसा आर्थिक व्यवहार कभी नहीं करना चाहिये?
उत्तर..अस्वस्थः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः।
(अनैतिक आर्थिक व्यवहार कभी नहीं करना चाहिये)
(ङ) स्वावलम्बनं कस्य मूलं वर्तते ?
(स्वावलंबन किसका आधार है?)
उत्तर..स्वावलम्बनं स्वाभिमानस्य मूलं वर्तते।
(आत्मनिर्भरता स्वाभिमान का आधार है।
(च) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः किं पूर्यते ?
(जल की एक एक बूँ द गिरने से क्या भरता है ?)
उत्तर…जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः घटः पूर्यते।
(जल की एक एक बूँ द गिरने से घड़ा भरता है)
2..पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत – (पूर्णवाक्य में उत्तर लिखो….)
(क) “सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः” इतीदं प्रसिद्धं वाक्यं कस्मिन् ग्रन्थे प्राप्यते ?
(सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूलधन यह प्रसिद्ध वाक्य किस ग्रन्थ में पाया जाता है ?)
उत्तर“सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः” इतीदं प्रसिद्धं वाक्यं कौटिल्यस्य अर्थशास्त्र इति ग्रन्थे प्राप्यते।
(कौटिल्य के अर्थशस्त्र में.)
(ख) सामान्यजीवने कासाम् आवश्यकतानां पूर्त्यर्थं धनम् आवश्यकम् ?
(सामान्य जीवन में किन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन आवश्यक है?)
उत्तर.. सामान्यजीवने अन्न वस्त्रं आवासम्, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा इत्यादीनां आवश्यकतानां पूर्त्यर्थं धनम् आवश्यकम्।
(सामान्य जीवन में अन्न, वस्त्र, आवास,शिक्षा, स्वास्थ्य आदि मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन आवश्यक है)
(ग) ब्राह्मे मुहूर्ते कयोः चिन्तनम् आवश्यकम् ?
ब्रह्म मुहूर्त में किनका चिन्तन आवश्यक है?
उत्तर..ब्राह्मे मुहूर्ते धर्मर्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।
(ब्रह्म मुहूर्त में धर्म और अर्थ का चिन्तन आवश्यक है)
घ) जनः केन स्वावलम्बी भवति ?
(मनुष्य किसके द्वारा स्वावलम्बी बनता है?)
उत्तर…जनः धनसंचयेन स्वावलम्बी भवति।
(मनुष्य धन के संचय से स्वावलम्बी बनता है?)
(ङ) लघुलघुसञ्चयः अपि कालान्तरे केन रूपेण वर्धते ?
(छोटी-छोटी बचत भी समय के साथ किस रूप में बढ़ती है?
उत्तर..लघुलघुसञ्चयः अपि कालान्तरे महत्संम्पत्तिरूपेण रूपेण वर्धते।
(छोटी-छोटी बचत भी समय के साथ बड़ी सम्पत्ति के रूप में बढ़ती है)
३. वाक्येन सह ग्रन्थस्य सम्मेलनं कुरुत –
वाक्य के साथ उनके ग्रन्थों को मिलाओ )

उत्तर…
| (क) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः । | ४. चाणक्यनीतिः |
| (ख)ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्। | १. गरुडपुराणम् |
| (ग) सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् | २. मनुस्मृतिः |
| (घ) सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः | ४. चाणक्यनीतिः |
४. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –
(रेखांकित शब्दों के आधार पर प्रश्न निर्माण करो.)
(क) सुखस्य मूलं धर्मः ।
(ख) दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।
(ग) सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम्।
(घ) अनैतिकः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः ।
(ङ) संकटकाले स्वाभिमानिजनः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते।
उत्तर….
- (क) कस्य मूलं धर्मः ?
- (ख) दिनस्य आरम्भे कयोः चिन्तनम् आवश्यकम्?
- (ग) सन्मार्गेण एव किम् करणीयम्?
- (घ) कीदृशः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः ?
- (ङ) संकटकाले कः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते?
५. उचितैः पदैः रिक्तस्थानानि पूरयत -( उचित शब्दों से रिक्त स्थान भारो..)
| विद् | विद्यते | विद्येते | विद्यन्ते |
| लभ् | ………………… | लभेते | लभन्ते |
| अपेक्ष् | अपेक्षते | …………….. | अपेक्षन्ते |
| वर्ध् | ………………… | वर्धेते | …………… |
| सेव् | ………………… | ……………… | सेवन्ते |
| मोद् | मोदते | ………………. | ……………. |
उत्तर…
| विद् | विद्यते | विद्येते | विद्यन्ते |
| लभ् | लभते | लभेते | लभन्ते |
| अपेक्ष् | अपेक्षते | अपेक्षेते | अपेक्षन्ते |
| वर्ध् | वर्धते | वर्धेते | वर्धन्ते |
| सेव् | सेवते | सेवेते | सेवन्ते |
| मोद् | मोदते | मोदेते | मोदन्ते |
६. अधोलिखितानां प्रश्नानां शुद्धं विकल्पं चिनुत –
(नीचे लिखे गये शब्दों के सही विकल्प चुनो.)
(क) “सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः” इत्यस्य मुख्य आशयः कः अस्ति ?
- (१) सुखस्य आधारः केवलम् अर्थः एव ।
- (२) धर्मस्य आधारः केवलं सुखम् एव ।
- (३) धर्मस्य आधारः अर्थः, सुखस्य आधारः धर्मः ।
- (४) सुखं, धर्मः, अर्थः – एतेषां मध्ये सम्बन्धः नास्ति ।
उत्तर….धर्मस्य आधारः अर्थः, सुखस्य आधारः धर्मः ।
(ख) गरुडपुराणे किम् उपदिष्टम् अस्ति ?
- (१) रात्रौ धनस्य चिन्तनं करणीयम् ।
- (२) प्रभाते धर्मार्थयोः चिन्तनं करणीयम्।
- (३) केवलं धर्मचिन्तनं करणीयम् ।
- (४) केवलम् अर्थचिन्तनं करणीयम्।
उत्तर…प्रभाते धर्मार्थयोः चिन्तनं करणीयम्।
(ग) “सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्” इत्यस्य तात्पर्यं किम् ?
- (१) जलशौचमेव श्रेष्ठम् ।
- (२) मृद्वारिशौचमेव श्रेष्ठम् ।
- (३) अर्थशौचं सर्वोपरि, अन्यविधशौचेभ्यः श्रेयः ।
- (४) शौचस्य आवश्यकता नास्ति।
उत्तर.. अर्थशौचं सर्वोपरि, अन्यविधशौचेभ्यः श्रेयः ।
(घ) छात्रैः क्रियमाणः अपव्ययः कः ?
- (१) स्वास्थ्यलाभाय व्ययः ।
- (२) विद्यार्जनाय व्ययः ।
- (३) आडम्बरयुक्तः प्रदर्शनात्मकः व्ययः ।
- (४) आत्मसुरक्षायै व्ययः ।
उत्तर..आडम्बरयुक्तः प्रदर्शनात्मकः व्ययः ।
(ङ) “जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः” इति वाक्यं कः अवदत् ?
- (१) बृहस्पतिः
- (२) चाणक्यः
- (३) मनुः
- (४) याज्ञवल्क्यः
उत्तर…चाणक्यः
Sanskrit Class 9 Chapter 2 Question Answer
Q1. ‘सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलं अर्थः’पाठ का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इस पाठ का मुख्य संदेश है कि नियमित अभ्यास, नैतिक धनार्जन तथा उचित आर्थिक व्यवहार से व्यक्ति जीवन में सफलता प्राप्त करता है।
Q2. ‘सुखस्य मूलं धर्मः’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: वास्तविक सुख का आधार धर्म है तथा धर्म के पालन के लिए अर्थ आवश्यक माना गया है।
Q3. स्वावलम्बन किसका मूल है?
उत्तर: स्वावलम्बन स्वाभिमान का मूल है।
Q4. ‘जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः’ का क्या आशय है?
उत्तर: छोटी-छोटी बचत और निरन्तर प्रयास समय के साथ बड़ी उपलब्धि में परिवर्तित हो जाते हैं।
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