Class 9 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः

सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः अध्याय परिचय

“सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः” Class 9 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation यह पाठ विद्यार्थियों को धर्म, अर्थ और सुख के पारस्परिक संबंध का ज्ञान कराता है। आचार्य कौटिल्य के इस प्रसिद्ध सूत्र के माध्यम से बताया गया है कि जीवन में वास्तविक सुख का आधार धर्म है और धर्म के पालन के लिए अर्थ अर्थात् धन आवश्यक है।

इस पाठ में धन के न्यायपूर्ण अर्जन, उचित व्यय, नियमित संचय तथा सुरक्षित निवेश के महत्व को सरल उदाहरणों सहित समझाया गया है। साथ ही विद्यार्थियों को आर्थिक साक्षरता का महत्व बताते हुए अपव्यय से बचने, बचत की आदत विकसित करने तथा भविष्य के प्रति सजग रहने की प्रेरणा दी गई है।

पाठ में मनुस्मृति, उपनिषद, चाणक्यनीति तथा अन्य ग्रंथों के उद्धरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि धन का सदुपयोग व्यक्ति को आत्मनिर्भर, उत्तरदायी और सफल बनाता है। यह अध्याय विद्यार्थियों को धर्म, अर्थ और सुख के संतुलन का संदेश देकर आदर्श जीवन की ओर प्रेरित करता है।

Class 9 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation

सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः

भारतीयधर्मशास्त्रेषु अनेकाः सूक्तयः विद्यन्ते, याः मानवजीवनस्य यथार्थतत्त्वं प्रतिपादयन्ति। तेष्वेकं प्रसिद्धं सूत्ररूपं वाक्यं कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे अस्ति –

” सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः ।” सुख का aadhaar धर्म है तथा धर्म का मूल या आधार अर्थ (धन )है।

अस्य आशयः अस्ति यत् वास्तविकसुखस्य आधारः धर्मः, धर्मपालनस्य च आधारः अर्थः। अर्थः इत्युक्ते धनं, यत् सर्वविधस्य आजीविकाव्यवहारस्य प्रमुखं साधनम् ।

जीवने धर्मः, अर्थः, सुखम् इत्येतेषां त्रयाणां परस्परसम्बन्धः अविच्छिन्नः अस्ति। यः जनः न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति, सः धर्मपालनं कर्तुं समर्थः भवति, धर्मपालनेन च दीर्घकालिकं सुखं लभते ।

शब्दार्थ…

  • सुखस्य =सुख का
  • मूलं =आधार
  • अर्थः =धन
  • सर्वविधस्य=सभी प्रकार की
  • अविच्छिन्नः=अटूट

हिन्दी अनुवाद… भारतीय धर्मशात्र में अनेक सूक्तियां विद्यमान हैं, जो मानव जीवन के वास्तविक तत्व को प्रतिपादित करती हैं। उनमें से एक प्रसिद्ध सूत्र के रूप में एक वाक्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र में है….

सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः ।” सुख का मूल धर्म है तथा धर्म का मूल अर्थ (धन )है। इसका भावार्थ है.. कि जीवन में वास्तविक सुख का आधार धर्म है… और धर्म पालन का आधार धन है। अर्थ ऐसा कहने पर धन, जो सभी प्रकार की आजीविका. और व्यवहार का प्रमुख साधन है।

जीवन में धर्म , अर्थ (धन) और सुख इन तीनों का आपस में अटूट अर्थात बहुत घनिष्ठ संबन्ध है। जो मनुष्य न्याय पूर्वक धन अर्जित करता है, वह धर्म पालन करने में भी समर्थ होता है और धर्म का पालन करने से लम्बे समय तक सुख मिलता है।

सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, शिक्षा, स्वास्थ्यसेवा चेत्यादीनां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूर्तये धनम् आवश्यकम् । पर्याप्तधनस्य अभावात् स्वकर्तव्यपालनं कठिनं भवति। स्वास्थ्यं, शिक्षा, सेवा, दानम् चेत्यादीनि कार्याणि बाधितानि भवन्ति । दैनन्दिनजीवनं च असन्तुलितं भवति। अतः धर्मशास्त्रे चतुर्वर्गेषु धर्मार्थकाममोक्षेषु अर्थः अन्यतमः स्तम्भः इति गण्यते। उक्तं गरुडपुराणे –

“ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।”
अर्थात् दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।

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शब्दार्थाः –

  • आवास = घर
  • पूर्तये = पूर्ति के लिए
  • बाधितानि =बाधित
  • दैनन्दिन = दैनिक
  • अन्यतम = अद्वितीय / सर्वश्रेष्ठ
  • गण्यते=गिना जाता है
  • उक्तम्=कहा गया है
  • उत्थाय = उठकर
  • चिन्तयेत् = चिन्तन करना चाहिये

हिन्दी अनुवाद…सामान्य जीवन में अन्न, वस्त्र, घर, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा इत्यादि मूलभूत (basic)आवश्कताओं की पूर्ति के लिए धन आवश्यक है। पर्याप्त धन के अभाव से अपने कर्त्तव्य का पालन (भी) कठिन हो जाता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सेवा और दान इत्यादि कार्यों में बाधा आती हैं। दैनिक जीवन असन्तुलित होता है। इसलिए धर्मशास्त्र में लिखे हुए धर्म,अर्थ, काम, मोक्ष इन चार (पुरुषार्थों ) में अर्थ एक महत्वपूर्ण स्तम्भ गिना जाता है। (अर्थात इन चारो में धन मुख्य आधार माना जाता है )गरुड़ पुराण में कहा गया है-

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ का चिन्तन करें अर्थात् प्रातः काल उठ कर दिन के आरम्भ में धर्म और अर्थ का चिन्तन करना आवश्यक है।

स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः त्रिविधः भवति –

1.न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम्

– सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम् इति। उक्तं भगवता मनुना –
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।
योऽर्थे शुचिर्हि सः शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः अस्य आशयः यत् अनैतिकः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः । “मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” इति उपनिषदः वाक्यं सततं मनसि निधाय स्वकौशलेन विद्यया च धनम् उपार्जनीयम् ।

शब्दार्थाः –

  • स्वस्थ – हृष्ट-पुष्ट।
  • आर्थिक अर्थ का।
  • त्रिविध – तीन प्रकार का।
  • उपार्जनम् – अर्जन।
  • शुचि – शुद्ध या पवित्र।
  • करणीयम् – करना चाहिए।
  • शौचानाम् – पवित्रता का।
  • शौचम् – पवित्रता स्मृतम्-कहा गया है।
  • मृदवारि – मिट्टी, जल।

सरलार्थः पवित्र अर्थ सम्बन्धी व्यवहार तीन प्रकार का होता है-

न्यायपूर्ण अर्थ-अर्जन

सन्मार्ग के द्वारा ही धन का अर्जन करना चाहिए। भगवान् मनु ने कहा है-

सभी प्रकार की पवित्रता में धन की पवित्रता ही प्रमुख है। जो (व्यक्ति) धन कमाने के सम्बन्ध में पवित्र(ईमानदार)है, वह ही पवित्र है। मिट्टी और जल के द्वारा (की गई) शुद्धता शुद्धता नहीं कही जाती है।

इसका तात्पर्य है कि अनैतिक रूप से धन कभी भी नहीं अर्जित करना चाहिए। “किसी के धन का लालच मत करो”। इस उपनिषद के वाक्य को निरन्तर मन में रखकर अपने कौशल और ज्ञान से धन को अर्जित करना चाहिए।

2.औचित्य पूर्ण व्ययः –

आवश्यकतानुसारं व्ययः करणीयः। येन व्ययेन स्वास्थ्यलाभः विद्यार्जनम् आत्मसुरक्षा वा भवेत्, सः व्ययः अवश्यं करणीयः । आडम्बरपूर्णः प्रदर्शनकारी व्ययः अथवा विलासव्यसनाय व्ययः अपव्ययः भवति। अपव्ययः वर्जनीयः, अतः प्रत्येकं व्ययस्य लेखः स्थापनीयः। अन्ते च तेषां परिशीलनं करणीयम् ।

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शब्दार्थाः –

  • औचित्यपूर्ण= उचित
  • करणीयः = करना चाहिए
  • आत्म=अपनी
  • आडम्बर= दिखावा
  • व्यसन = बुरी आदत
  • अपव्यय = फिजूल खर्चा
  • वर्जनीय =टालना चाहिए
  • स्थापनीय = करना चाहिए
  • परिशीलनम् =समीक्षा

हिन्दी अनुवाद –

उचित व्यय-मनुष्य को आवश्यकता के अनुसार व्यय करना चाहिए। जिस व्यय के द्वारा स्वास्थ्य लाभ, विद्या का अर्जन या आत्मसुरक्षा हो, वह व्यय अवश्य करना चाहिए। दिखावा से भरा हुआ प्रदर्शनकारी व्यय अथवा भोग विलास व नशे आदि व्यसन (मद्यपान आदि) के लिए (किया गया) व्यय अपव्यय होता है। अपव्यय नहीं करना चाहिए। इसलिए प्रत्येक व्यय का लेख(record)रखना चाहिए। अन्त में उनकी समीक्षा करनी चाहिए।

3..भविष्यदृष्ट्या सञ्चयः –

उपार्जितधनस्य कश्चन भागः भविष्यसुरक्षायै सञ्चयनीयः । सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः स्वावलम्बी भवति । स्वावलम्बनं स्वाभिमानस्य मूलं वर्तते। संकटकालेऽपि स्वाभिमानिजनः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते।

शब्दार्थ….

  • सञ्चय = एकत्र करना
  • कश्चन =कोई
  • सञ्चयनीय = एकत्र /सञ्चय करना चाहिये
  • अपेक्षते = अपेक्षित होता है।

हिन्दी अनुवाद… कमाये हुए धन का कुछ भाग भविष्य की सुरक्षा के लिये संचित करना चाहिये। (बचा कर रखना चाहिये ) बचत के अभ्यास से मनुष्य स्वावलम्बी(आत्मनिर्भर/ selfdepend)बनता है। आत्मनिर्भरता स्वाभिमान का आधार है। संकट (मुसीबत) के समय भी स्वाभिमानी व्यक्ति दूसरे लोगों से आर्थिक सहायता की अपेक्षा (expection) नहीं रखता है।

छात्रजीवने आर्थिकसाक्षरता…. छात्र जीवन में आर्थिक साक्षरता….

अनेकदा छात्राः मातापितृभ्यां कष्टार्जितधनस्य तुच्छकारणैः अपव्ययं कुर्वन्ति। जिह्वालालसापूर्त्यर्थं त्वरिताहारः, शीतपेयं, पुटीकृतभोजनं, तथैव व्यसनपदार्थानां सेवनं, प्रदर्शनकारिपरिधानं विलासितापूर्णम् आचरणं चेत्यादि यत्र प्रभूतः अपव्ययः भवति। एतैः न केवलं धनहानिः, स्वास्थ्यहानिरपि जायते। स्वास्थ्यहानिकारणात् पुनः धनव्ययो वर्धते।

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शब्दार्थ….

  • अनेकदा =अनेक बार
  • कष्टार्जितधनस्य=कठिन परिश्रम से कमाये हुए धन का
  • तुच्छकारणैः = अनुचित जरुरतों पर
  • जिह्वा =जीभ
  • अपव्यय = फिजूल खर्च
  • लालसा =लालच
  • त्वरिताहारः=फास्ट फूड
  • पुटीकृतभोजनं=डिब्बाबन्द भोजन
  • परिधान =वेष भूषा /पहनावा
  • प्रभूतः = अत्यधिक
  • जायते =उत्पन्न होता है
  • वर्धते =बढ़ता है।

हिन्दी अनुवाद..कई बार छात्र माता पिता द्वारा कठिन परिश्रम से कमाये गये धन का गैरजरुरी चीजों पर अपव्यय करते हैं। जीभ की लालसा की पूर्ति अर्थात स्वाद की पूर्ति के लिये फास्ट फूड, ठण्डा पेय (cold drink ) डिब्बा बन्द फूड तथा व्यसन अर्थात नशे जैसी पदार्थों का सेवन, दिखावे से युक्त वस्त्र पहनना, विलासिता पूर्ण व्यवहार करना आदि जिस पर अत्यधिक धन का व्यय होता है। इससे केवल धन ही हानि नहीं होती है बल्कि स्वास्थ्य की भी हानि होती है। स्वास्थ्य खराब होने से पुनः धन का व्यय बढ़ता है।

अर्जितस्य सञ्चयः सञ्चितस्य च निवेशः कमाये हुए धन का संचय तथा संचित धन का निवेश (investment)

चाणक्यनीतौ उक्तम् – चाणक्य नीति में कहा गया है…

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥

शब्दार्थ…

  • जलबिन्दु=पानी की बूँद
  • निपातेन= गिरने से
  • पूर्यते =भर जाता है
  • घटः =घड़ा

श्लोक हिन्दी अनुवाद…पानी की एक-एक बूँद गिरने से घड़ा धीरे-धीरे भर जाता है। यही क्रम सभी विद्याओं का, धन और धर्म का है। अर्थात जिस प्रकार पानी की एक-एक बूँद गिरने से घड़ा धीरे-धीरे भर जाता है, उसी प्रकार लगातार थोड़ा – थोड़ा अभ्यास करने से विद्या,धन और धर्म भी प्राप्त हो जाता है।

लघु-लघुः सञ्चयोपि कालान्तरे महत्सम्पत्तिरूपेण वर्धते ।यदि छात्राः प्रतिदिनम् अल्पधनस्यापि सञ्चयं कुर्वन्ति, तस्य उचितनिवेशं च कुर्वन्ति तर्हि तेषां भविष्यं सुरक्षितं भवेत्। भारतदेशे धनसञ्चयस्य सुरक्षितनिवेशस्य च कृते बहुविधाः मार्गाः सन्ति। तेषु प्रधानमन्त्री-जनधनयोजना, सुकन्या-समृद्धि-योजना, सार्वजनिक-भविष्य-निधिः,वरिष्ठ-नागरिक-संचय-योजना, किसान-विकास-पत्रं, राष्ट्रिय-संचय-प्रमाणपत्रं, राष्ट्रिय-पेंशन-योजना, नियw२yतनिक्षेपः, आवृत्तिनिक्षेपः चेत्याद्याः प्रमुखाः सन्ति।

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एतासां सर्वकारीययोजनानां विषये सूचनाःलब्धुं लाभमवाप्तुं च समीपस्थवित्तागाराः पत्रालयाः वा गन्तव्याः, तत्सम्बद्धाः अधिकारिणः च प्रष्टव्याः। एतासु योजनासु न केवलं कष्टार्जितधनस्य सुरक्षा भवति अपि तु चक्रवृद्ध्यंशेन सह तद्धनं सततं वर्धमानं भवति ।

शब्दार्थ…

  • लघुः =छोटा
  • कालान्तरे = कुछ समय बाद
  • वर्धते= बढ़ता है।
  • अल्प =थोड़ी
  • सर्वकारी =सरकारी
  • कृते = के लिये
  • बहुविधाः = अनेक प्रकार के
  • समीपस्थ = पास स्थित
  • वित्तगाराः = बैंक
  • पत्रालयाः = पोस्टआफिस
  • प्रष्टव्याः = पूछना चाहिये

हिन्दी अनुवाद..छोटी – छोटी बचत भी समय के साथ बड़ी . सम्पत्ति के रूप में बढ़ जाती है।. .. यदि छात्र प्रतिदिन थोड़े ( थोड़े)धन का भी सञ्चय करते हैं और उसका उचित निवेश(proper investment )करते हैं, तो उनका भविष्य सुरक्षित होगा। भारत में धन की बचत /संचय और धन के सुरक्षित निवेश के लिये बहुत सारे साधन हैं, उन साधनों में प्रधानमन्त्री जनधन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, सार्वजनिक भविष्यनिधि, वरिष्ठ नागरिक सञ्चय योजना, किसान विकास पत्र,राष्ट्रीय सञ्चय प्रमाण पत्र, राष्ट्रीय पेंशन योजना, नियत जमा (fixed deposit )तथा आवर्ती जमा (recurring deposit ) आदि प्रमुख हैं।

इन सभी सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने तथा लाभ प्राप्त करने के लिये समीप स्थित बैंक या पोस्ट ऑफिस जाना चाहिये और उनसे संबन्धित अधिकारियों से पूछ -ताछ करनी चाहिये। इन सभी योजनाओं में न केवल मेहनत से कमाये हुए धन की सुरक्षा होती है बल्कि चक्रवृद्धि ब्याज (compound intrest) के साथ वह धन निरन्तर बढ़ता रहता है।

Class 9 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः

भौतिकतावादियुगस्य आकर्षणेन यूनामपव्ययः अधिको भवति येन कारणेन अस्माकम् आर्थिकस्थितिः विपन्ना भवति। किन्तु अर्थविषयकसचेतनता अस्मान् अभावात् उद्धृत्य आर्थिकसम्पन्नतां प्रति नयति। अतः बुद्धिमतां छात्राणां ध्येयं स्यात् – धनस्य उचितोपार्जनम्, व्ययस्य मर्यादा, आपत्कालीननिधिसञ्चयः, दीर्घकालीननिवेशश्च । यः एतेषाम् अनुशासनेन पालनं करोति, स एव यथार्थतः धनस्य धर्मस्य च सन्तोलनं स्थापयितुं शक्नोति । यः विद्यार्थी अद्य अर्थविषये जागरूकोऽस्ति, सः भविष्ये उत्तरदायी नागरिको भवति। धर्मः, अर्थः, सुखम् चेत्येतेषां सन्तोलनम् एव यथार्थजीवनस्य लक्षणम्। अत एवोक्तम् –

श्लोक…
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥

शब्दार्थ…

  • युनाम् = युवाओं का
  • विपन्ना = कमजोर होना
  • सचेतनता=जागरुकता
  • उद्धृत्य =निकाल कर
  • आपत्कालीन=संकट के समय के लिये
  • यथार्थतः =वास्तव में
  • उत्तरदायी= जिम्मेदार
  • क्षणशः= एक-एक क्षण
  • कणशः = एक एक कण ( छोटा से छोटा हिस्सा )
  • साधयेत् = प्राप्त करना चाहिये
  • नष्टे = नष्ट होने पर

भौतिकवादी(Materialistic) युग कॆ आकर्षण के कारण युवाओं का अपव्यय (फिजूल खर्च ) अधिक हो जाता है, जिस कारण हमारी आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है। परन्तु आर्थिक (धन के )विषय में जागरुकता हमें अभाव से निकाल कर आर्थिक संपन्नता की ओर ले जाती है। अतः बुद्धिमान छात्रों का लक्ष्य होना चाहिये…. धन का उचित अर्जन , खर्च करने की सीमा (limit) निर्धारित करना , संकट के समय के लिये धन का सञ्चय तथा दीर्घ कालीन निवेश। जो व्यक्ति इन सब का अनुशासन के साथ पालन करता है, वह ही वास्तव में धर्म और धन में संतुलन स्थापित कर सकता है।जो विद्यार्थी आज धन के विषय में जागरुक है, वह भविष्य में एक जिम्मेदार / उत्तरदायी नागरिक होता है। धर्म, धन और सुख इनका संतुलन ही यथार्थ(real) जीवन का लक्षण है। इसीलिये कहा गया है…

श्लोक हिन्दी अनुवाद…

हमें एक-एक क्षण का उपयोग करके विद्या प्राप्त करना चाहिये और और एक-एक कण (छोटा हिस्सा) बचाकर धन प्राप्त करना चाहिए। यदि आप एक क्षण भी व्यर्थ करते हैं, तो विद्या कैसे मिलेगी? और यदि आप एक कण (पैसा या संसाधन) गंवाते हैं, तो धन कहाँ से आएगा?

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class 9 chapter 1 सत्यं शिवम् सुन्दरं संस्कृतं..हिन्दी translation के लिये इसे पढ़िये

https://gyanvahini.com/class-9-sanskrit-chapter-1-hindi-anuvaad/

Class 9 Sanskrit Chapter 1Solutions सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम् – प्रश्न-उत्तर

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