NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 5 Hindi Translation Geeta Sugeeta Kartavya

Class 8 Sanskrit Chapter 5 Hindi Translation Geeta Sugeeta Kartavya गीता सुगीता कर्तव्या.. इस पाठ में कुरुक्षेत्र में मनाये गये गीता जयन्ती महोत्सव के प्रसंग के माध्यम से गीता के महत्व के बारे में समझाया गया है। तथा भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिये गये उपदेश के कुछ महत्व पूर्ण श्लोक के बारे में बताया गया है।

NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 5 Hindi Translation..

मूल पाठ श्लोक अन्वय भावार्थ हिन्दी अनुवाद कठिन शब्दार्थ

कुरुक्षेत्रे श्रीगीता-जयन्ती-महोत्सवः आचरितः। तत्र बहवः जनाः अगच्छन्। रमेशः अपि स्वजनकेन सह तत्र गतवान्। कथावाचकः गीतायाः विषये वर्णयति स्म –

शब्दार्थ..

  • आचरितः= मनाया गया या आयोजित किया गया
  • बहवः= बहुत
  • तत्र गतवान्= वहाँ गया
  • गीतायाः= गीता के
  • स्वजनकेन सह= अपने पिता कॆ साथ


हिन्दी अनुवाद.. कुरुक्षेत्र में श्री गीता जयन्ती मनायी गयी। वहां बहुत सारे लोग गये। रमेश भी अपने पिता के साथ वहां गया। कथावाचक (कथा सुनाने वाले)गीता कॆ विषय में वर्णन कर रहे थे।

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता ॥

शब्दार्थ..

  • सुगीता= अच्छी तरह से गायी गई
  • शास्त्रविस्तरैः= अन्य शास्त्रों के विस्तार से

हिन्दी अनुवाद…गीता को अच्छी तरह से गाया ( पढ़ा व सुना)जाना चाहिये जो स्वयं भगवान विष्णु के मुख कमल से निकली है। अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या?

(अर्थात…. गीता को ही अच्छी तरह से पढ़ना और समझना चाहिए क्योंकि यह साक्षात भगवान श्री कृष्ण के मुख से निकली है , तथा गीता में ही सारे वेद शास्त्र और उपनिषदों का सार समाहित है। अतः जीवन का सही मार्ग दर्शन प्राप्त करने के लिये अन्य बड़े और विस्तृत ग्रन्थों को पढ़ने की आवश्यकता नहीं है।)

इदं श्रुत्वा रमेशः पितरम् अपृच्छत्- “पितः ! गीता का? कथं सुगीता कर्तव्या?” श्रुत्वा =सुन कर
यह सुन कर रमेश ने पिता से पूछा — पिता जी गीता क्या है? कैसे सुन्दर गाना करना चाहिये?

पिता – पुत्र ! बहुभ्यः वर्षेभ्यः पूर्वं कुरुक्षेत्रे कौरवाणां पाण्डवानां च मध्ये सङ्ग्रामः अभवत्। तस्मिन् युद्धे स्वबान्धवान् दृष्ट्वा अर्जुनः युद्धं कर्तुं न इच्छति स्म। तदा भगवान् श्रीकृष्णः युद्धपराङ्गुखम् अर्जुनं कर्तव्यपालनार्थम् उपदिष्टवान्। श्रीकृष्णस्य उपदेशः एव श्रीमद्भगवद्गीता अस्ति। गीतायाम् अमृततुल्याः उपदेशाः सन्ति ।

शब्दार्थ…

  • सङ्ग्रामः=युद्ध
  • अभवत्=हुआ
  • स्वबान्धवान्=अपने भाई बन्धुओं को
  • युद्धपराङ्गुखम्= युद्ध से विमुख अर्थात युद्ध नहीं करना चाहते थे
  • उपदिष्टवान्= उपदेश दिया
  • अमृततुल्याः=अमृत के समान

Sanskrit Class 8 Chapter 5 Hindi

Geeta Sugeeta Kartvya

हिन्दी अनुवाद…पिता ने कहा –पुत्र ! बहुत वर्षों पूर्व कुरुक्षेत्र में कौरवों और पाण्डवों के मध्य युद्ध हुआ था। उस युद्ध में अपने बन्धुओं को देख कर अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे। तब श्रीकृष्ण नें युद्ध से विमुख अर्जुन को उनका कर्तव्य पालन करने के लिये उपदेश दिया।श्रीकृष्ण का उपदेश ही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाता है। गीता में अमृत के समान उपदेश दिये गये हैं।

रमेशः – तर्हि सुगीता कर्तव्या इत्यस्य कः आशयः ?
रमेश.. तो सुगीता का क्या अर्थ है?

पिता अस्य आशयः अस्ति यत गीतायाः अभ्यासः सम्यक रूपेण करणीयः। गीता उत्तमभावेन पठितव्या। कार्यक्षेत्रे जीवनक्षेत्रे च गीतायाः उपदेशाः अनुपालनीयाः । अस्मिन पाठे वयं श्रीमद्भगवद्गीतायाः काँश्चन श्लोकान् पठामः । वयं श्लोकान मिलित्वा गायामः अपि।

शब्दार्थ…

  • इत्यस्य (इति +अस्य ) =इसका
  • आशयः =अर्थ या तात्पर्य
  • सम्यक रूपेण = सही तरह से
  • पठितव्या= पढ़ा जाना चाहिए
  • अनुपालनीयाः= पालन करना चाहिये
  • काँश्चन=कुछ
  • मिलित्वा =मिल कर
  • गायामः=गाते हैं

पिता… इसका अर्थ है कि गीता का अच्छी प्रकार से अध्ययन और अभ्यास करना चाहिये। गीता को उत्तम भाव से पढ़ना चाहिये। कार्यक्षेत्र और जीवन के क्षेत्र में भी गीता के उपदेश पालन करने योग्य हैं। इस पाठ में हम श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोकों को पढ़ते हैं। हम श्लोकों को मिल कर गाते भी हैं।

महाभारत के युद्ध में भ्रमित अर्जुन को श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया

गीता सुगीता कर्तव्या .. श्लोक

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ १ ॥

पदच्छेदः – दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीत-राग-भय-क्रोधः स्थितधीः मुनिः उच्यते।

अन्वयः – दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीत-राग-भय-क्रोधः मुनिः स्थितधीः (इति) उच्यते।

  • दुखेषु = दुखों में
  • अनुद्विग्नमनाः= स्थिर या शांत मन वाला
  • विगतस्पृहः=इच्छा या आसक्ति रहित
  • वीत= छूट गया हो या मुक्त हो गया हो
  • रागभयक्रोधः= मोह, भय और क्रोध से मुक्त
  • स्थितधीः= स्थिर बुद्धि वाला
  • उच्यते =कहा जाता है।

श्लोक हिन्दी अनुवाद.. जो व्यक्ति दुख प्राप्त होने पर विचलित या दुखी नहीं होता है, सुखों की प्राप्ति में जिसे कोई आसक्ति नही होती है, तथा जो मोह , भय, तथा क्रोध से पूर्णतः रहित है , वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहलाता है।

भावार्थ – यः मनुष्यः आपत्कालेषु उद्वेगं न अनुभवति। यः सुखप्राप्तये अपि निस्पृहः (इच्छारहितः) भवति। यः इच्छा, आसक्तिः, भयः, क्रोधः, इत्येतेभ्यः मुक्तः भवति। सः मौनी पुरुषः स्थितप्रज्ञः भवति।

भावार्थ हिन्दी अनुवाद ..जो व्यक्ति आपदा के समय में भी स्थिर और शान्त मन वाला रहता है। सुख के साधन प्राप्त होने पर भी सुख की इच्छा से रहित रहता है। जो किसी प्रकार की इच्छा , आसक्ति , भय (डर) क्रोध इत्यादि भावों से मुक्त होता है। वह स्थित प्रज्ञ मुनि होता है।

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ २ ॥

पदच्छेदः – क्रोधात् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।

अन्वयः – क्रोधात् सम्मोहः भवति । सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः (भवति)। स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः (भवति)। बुद्धिनाशात् (जनः) प्रणश्यति ।

शब्दार्थ…

  • क्रोधात् =क्रोध से
  • सम्मोहः= सम्मोह
  • स्मृतिविभ्रमः =स्मरण शक्ति का नाश
  • प्रणश्यति = नष्ट हो जाता है।

हिन्दी अनुवाद… क्रोध से सम्मोह उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृति का नाश होता है, स्मृति नाश से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि का नाश होने से मनुष्य स्वयं ही नष्ट हो जाता है।

भावार्थः – मानवस्य यदा क्रोधः भवति तदा क्रोधात् अविवेकः उत्पद्यते। अविवेकात् आत्मानं विस्मरति। किं योग्यं किञ्च अयोग्यम् इति अविचिन्त्य क्रोधात् व्यामोहं प्राप्नोति। यदा अधिकः व्यामोहः भवति तदा मनुष्यस्य स्मृतिः निष्क्रिया नष्टा च भवति । स्मृतेः नाशात् बुद्धिः नश्यति । बुद्धेः नाशात् सः मनुष्यः विनाशं प्राप्नोति

(अविवेक =सोचने समझने की शक्ति का अभाव )

भावार्थ…मनुष्य को जब क्रोध होता है , तो क्रोध से अविवेक उत्पन्न होता है। अविवेक से वह स्वयं को भूलता है। क्या करने योग्य है और क्या नहीं करने योग्य है यह नहीं सोच पाता है और क्रोध से भ्रम उत्पन्न होता है , जब अत्यधिक विभ्रम उत्पन्न हो जाता है तब मनुष्य की स्मृति निष्क्रिय और नष्ट हो जाती है। स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य विनाश को प्राप्त होता है अर्थात बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य स्वयं ही नष्ट हो जाता है।

NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 5 Hindi Translation Geeta Sugeeta Kartavya

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३ ॥

NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 5 Hindi Translation Geeta Sugeeta Kartavya

पदच्छेदः – तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम् ज्ञानिनः तत्त्वदर्शिनः

अन्वयः – तद् प्रणिपातेन सेवया परिप्रश्नेन विद्धि, ते तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः ज्ञानम् उपदेक्ष्यन्ति ।

शब्दार्थ…

  • विद्धि= उस ज्ञान को समझो /जानो
  • प्रणिपातेन= प्रणाम कर के
  • परिप्रश्नेन= प्रश्न पूछ कर
  • सेवया = सेवा कर के
  • उपदेक्ष्यन्ति= उपदेश देंगे ( यह लृट् लकार=भविष्य काल का का शब्द है)

श्लोक हिन्दी अनुवाद…उस तत्व ज्ञान को( गुरु को) प्रणाम करके , बार बार प्रश्न पूछ कर, गुरु की सेवा कर के सीखो।तत्व ज्ञानी महापुरुष, उस यथार्थ ज्ञान का उपदेश देंगे।

भावार्थः – भगवान् श्रीकृष्णः अर्जुनम् उपदिशति हे अर्जुन ! भवान् गुरोः समीपं गत्वा यथार्थज्ञानं प्राप्तुं प्रयासं करोतु । भवान् विनीतः जिज्ञासुः च भूत्वा गुरोः सेवां करोतु । तत्त्वज्ञानी गुरुः भवते ज्ञानं प्रदास्यति। यतः ये सत्यस्य दर्शनं कृतवन्तः ते एव यथार्थज्ञानिनः भवन्ति ।

भावार्थ…. भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं… हे अर्जुन! तुम गुरु के समीप जा कर यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करो। आप विनम्र और जिज्ञासु(curious)हो कर गुरु की सेवा करो। तत्वज्ञानी गुरु आपको ज्ञान देंगे। क्योंकि जिन्होंनें सत्य का दर्शन किया हो, वे ही यथार्थ ज्ञानी होते हैं।

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ४ ॥

पदच्छेदः श्रद्धावान लभते ज्ञानम् तत्परः संयतेन्द्रियः ज्ञानम् लब्ध्वा पराम : शान्तिम् अचिरेण अधिगच्छति।

अन्वयः संयतेन्द्रियः तत्परः श्रद्धावान् (मनुष्यः) ज्ञानं लभते । तथा ज्ञानं लब्ध्वा (सः) अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति।

शब्दार्थ..

  • श्रद्धावान=श्रद्धा से युक्त
  • संयतेन्द्रियः= जिसकी इन्द्रियां उसके वश में हों
  • लभते=प्राप्त करता है
  • लब्ध्वा= प्राप्त करके

श्लोक का हिन्दी अनुवाद.. इन्द्रियों को वश में रखने वाला , तत्पर तथा श्रद्धा से युक्त व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है। तथा ज्ञान प्राप्त कर के अति शीघ्र परम आन्तरिक शान्ति प्राप्त करता है।

भावार्थः – यः श्रद्धालुः मनुष्यः दिव्यज्ञानं प्राप्तुं निरन्तरं प्रयासं करोति। तथैव यः मनुष्यः इन्द्रियाणि स्ववशे कृतवान् । सः मनुष्यः दिव्यज्ञानं प्राप्स्यति। तादृशं दिव्यं ज्ञानं प्राप्य सः पुरुषः जीवने अनन्तम् आनन्दं प्राप्नोति ।

भावार्थ…. जो श्रद्धालु मनुष्य दिव्यज्ञान प्राप्त करने के लिये निरन्तर प्रयास करता है , जिस मनुष्य ने इन्द्रियों को अपने वश में किया है। वह मनुष्य दिव्य ज्ञान प्राप्त करेगा। उस दिव्य ज्ञान को प्राप्त करके वह मनुष्य जीवन में अनन्त आनन्द को प्राप्त करता है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरह‌ङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ ५ ॥

पदच्छेदः – अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुणः एव च निर्ममः निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।

अन्वयः – (यः) सर्वभूतानाम् अद्वेष्टा मैत्रः च करुणः एव निर्ममः निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी (अस्ति, सः एव मम प्रियः भवति ।)

शब्दार्थ…

  • अद्वेष्टा= द्वेष भाव से रहित
  • सर्वभूतानां= सभी प्राणियों का
  • निर्ममः= मोह माया से रहित
  • निरहङ्कारः= जिसे अहङ्कार न हो
  • समदुःखसुखः= सुख और दुख दोनों परिस्थितियों में एक समान रहने वाला
  • क्षमी= दूसरों को क्षमा करने वाला

श्लोक का हिन्दी अनुवाद…जो सभी प्राणियों से द्वेष से रहित है , मित्रता भाव से युक्त है , करुणावान है, मोह- माया से रहित है , अहङ्कार रहित है सुख दुख में एक समान रहने वाला है, दूसरों को क्षमा करने वाला है , (वह मनुष्य मुझे प्रिय होता है )

भावार्थः – हे अर्जुन ! यः कस्यामपि परिस्थितौ विचलितः न भवति । यः ईर्ष्यारहितः समस्तप्राणिनां कृते मित्रभावयुतः दयालुः च भवति। यः ममत्वरहितः, अहङकारविहीनः, सुखदुःखषु समभावयुतः क्षमाशीलः च भवति तादृशः पुरुषः भगवतः अत्यन्तं प्रियः भक्तः भवति।

भावार्थ.. हे अर्जुन ! जो मनुष्य किसी भी परिस्थिति में अस्थिर नहीं होता है। जो किसी से भी ईर्ष्या का भाव नहीं रखता है , जो सभी प्राणियों से मित्रता का भाव रखता है और दयालु होता है। जो मोह माया से रहित होता है, जिसमें अहङ्कार भाव नहीं होता है, जो सुख दुख में समान रहता है, जो दूसरों को क्षमा करने वाला होता है वैसा पुरुष भगवान का अत्यन्त प्रिय भक्त होता है।

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ….सन्तुष्टः सततम योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मयि अर्पितमनोबुद्धिः यः मद्भक्तः सः मे प्रियः।

अन्वयः – यः योगी सततं सन्तुष्टः यतात्मा दृढनिश्चयः मयि (च) अर्पितमनोबुद्धिः (भवति) सः मद्भक्तः मे प्रियः (भवति)।

शब्दार्थ…

  • सततम=निरन्तर /लगातार
  • यतात्मा= जिसने इन्दियों को वश में कर लिया है
  • मयि =मुझमे
  • यः =जो
  • मे = मेरा
  • मद्भक्तःमेरा भक्त

श्लोक का हिन्दी अनुवाद… जो योगी “जो निरंतर संतुष्ट रहने वाला है , अपने मन और इंद्रियों सहित शरीर को वश में करने वाला और दृढ़ निश्चय वाला है, तथा जिसने अपना मन और बुद्धि मुझमें अर्पित कर दिया हैं—वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।” –

भावार्थः – हे पार्थ ! यः निरन्तरं सन्तुष्टः भवति। अर्थात् कस्यापि वस्तुनः अभावा त् कदापि असन्तुष्टः न भवति। यः मनः इन्द्रियाणि च विजित्य संयमी भवति । यः स्वबुद्ध्या परमेश्वरस्य स्वरूपं स्थिरीकरोति। यश्च मनः बुद्धिं च ईश्वरे समर्पयति। सः मनुष्यः मम अतीव प्रियतमः भक्तः भवति ।

भावार्थ… हे अर्जुन! जो मनुष्य हमेशा संतुष्ट रहता है , अर्थात उसके पास जो कुछ भी उसमे संतुष्ट रहता है किसी भी वस्तुओं के अभाव से कभी भी असन्तुष्ट नहीं होता है। जिसने अपनी मन और इन्द्रियों को जीत कर संयमी हो गया है। जो अपनी बुद्धि के द्वारा परमेश्वर के स्वरूप को स्थिर करता है, जो अपने मन और बुद्धि को ईश्वर में समर्पित कर देता है, वह मनुष्य मेरा अति प्रिय भक्त होता है।

यस्मान्नोद्विजते लोकः लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ ७ ॥

पदच्छेदः– यस्मात् न उद्विजते लोकः लोकात् न उद्विजते च यः हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः यः सः च मे प्रियः।

अन्वयः – यस्मात् लोकः न उद्विजते, यः च लोकात् न उद्विजते, यः च हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः सः मे प्रियः (भवति)।

शब्दार्थ..

  • यस्मात्= जिससे
  • न उद्विजते= परेशान नहीं होता है
  • अमर्ष= ईर्ष्या से
  • भय=भय से
  • उद्वेगैः=चिन्ता से
  • मुक्तः= मुक्त है

भावार्थः – हे अर्जुन ! यस्मात् मनुष्यात् कोऽपि मनुष्यः प्राणी वा उद्विग्नः न भवति। यश्च मनुष्यः अन्यस्मात् जनात् प्राणिनः वा उद्विग्नः न भवति। यश्च हर्षेण, ईर्ष्याया, भीत्या, चिन्तया च रहितः भवति। सः मम अतीव प्रियः भक्तः भवति।

भावार्थ.. हे अर्जुन ! जिस मनुष्य से कोई भी मनुष्य या प्राणी परेशान नहीं होता है। और जो मनुष्य दूसरे मनुष्य या प्राणी से परेशान नहीं होता है और जो प्रसन्नता ईर्ष्या, भय और चिन्ता से रहित रहता है , वह मेरा. अत्यन्त प्रिय भक्त होता है।

अनुद्वेगकर वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्गमयं तप उच्यते ॥ ८॥

पदच्छेदः अनुद्वेगकरम् वाक्यम् सत्यम् प्रियहितम च यत् स्वाध्यायाभ्यसनम् च एव वाङ्गमयम् तपः उच्यते।

अन्वयः यद वाक्यम अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च (तथा) स्वाध्यायाभ्यसने च एव वाक्यं तपः उच्यते।

शब्दार्थ…

  • अनुद्वेगकरम्=जिससे किसी को दुख या कष्ट न हो
  • वाक्यम् = वचन / बात
  • सत्यम् = सत्य
  • प्रियहितम् = प्रिय और हितकारी
  • स्वाध्यायः = शास्त्रों का अध्ययन
  • अभ्यसनम् = अभ्यास
  • वाङ्मयम् = वाणी से सम्बन्धित
  • तपः = तप
  • उच्यते = कहा जाता है

हिन्दी अनुवाद…जो वाणी किसी को कष्ट या उद्वेग (उत्तेजना/मानसिक पीड़ा) न पहुँचाने वाली हो, जो सत्य हो, प्रिय (सुखद) और हितकारी (कल्याणकारी) हो, तथा वेदों एवं शास्त्रों का नियमित पठन-पाठन व अभ्यास हो—इसे ही वाणी का तप कहा जाता है।

भावार्थ: यत् अनुद्वेगकरं (भाषणम् उद्वेगं न जनयेत्), सत्यं, प्रियकर, हितकर, च भाषमं स्यात् तत् वाङ्गमयम् तपः इति कथ्यते । शास्त्रादीनां स्वाध्यायः तेषाम् अभ्यासः च वाचिकं तपः कथ्यते तथा स्वाध्यायः अभ्यासश्चापि यथाविधि वाङ्गमयम् तपः इति उच्यते। अतः विद्यार्थिभिः स्मरणीयं यत् –

भावार्थ हिन्दी अनुवाद….जिस वाणी से उद्वेग न होता हो जो सत्य युक्त हो, प्रिय हो ,और कलयाण कारी हो, वह वाक्य वाणी का तप कहा जाता है। नियमित रूप से शास्त्र आदि का स्वाध्याय और उसका अभ्यास वाणी का तप कहा जाता है ।इसी प्रकार विधिपूर्वक स्वाध्याय और उसका अभ्यास करना भी वाङ्मय तप कहलाता है। अतः विद्यार्थियों को यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि….

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः,
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचनेन का दरिद्रता।

प्रिय वचन बोलने से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं इसलिये प्रिय वाक्य ही बोलना चाहिये । प्रिय बोलने में कैसे कंजूसी?

गाँव के बाजार में परस्पर प्रसन्नता पूर्वक बात-चीत करते और हंसते लोग 
NCERT Class 8 Sanskrit Chapter 5 Hindi Translation Geeta Sugeeta Kartavya
एक बाजार जहाँ लोग एक दूसरे से प्यार से बात करते व प्रसन्न होते लोग

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