प्रणम्यो देशभ्क्तोऽयं गोपबन्धुर्महामना Deepakam Class 8 Sanskrit Chapter 4 Hindi Translation
Deepakam Class 8 Sanskrit Chapter 4 Hindi Translation प्रणम्यो देशभ्क्तोऽयं गोपबन्धुर्महामना। भारतभूमि पर अनेक ऐसे महापुरुषों का जन्म हुआ है, जिन्होंनें अपना जीवन मानवता, देशसेवा, समाज सेवा और देश की स्वन्त्रता के लिये अर्पित कर दिया।उत्कलमणि गोपबन्धुदास ऐसे ही महान समाज सेवक और देशभक्त थे।प्रणम्यो देशभ्क्तोऽयं गोपबन्धुर्महामना इस पाठ में उनके प्रेरणादायक जीवन, सेवा भावना, त्याग और देशभक्ति का वर्णन किया गया है।
प्रणम्यो देशभ्क्तोऽयं गोपबन्धुर्महामना हिन्दी अनुवाद
(एकदा जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं शिक्षकाः छात्राश्च सभागारे चर्चा कुर्वन्ति ।)
(एक बार बाढ़ पीड़ित लोगों की सहायता के लिये शिक्षक और छात्र सभागार में चर्चा करते हैं।)
नमस्ते छात्राः ! ह्यस्तनीं वार्ता श्रुतवन्तः किम् ?
नमस्कार छात्रों ! क्या कल का समाचार सुना?
नमो नमः आचार्य ! ओडिशा-राज्यस्य केन्द्रापडा-जनपदे महानद्यां भयङ्करः जलप्लावः सम्भूतः । जलप्लावेन तत्र महती हानिः सञ्जाता।
नमस्कार आचार्य ! ओडिशा (उड़ीसा)राज्य के केन्दपडा जनपद में महानदी में भयंकर बाढ़ आ गई । बाढ़ से वहाँ बहुत हानि हुई है ।
आम्, हिमानि ! त्वं सत्यं वदसि । जलप्लावेन वासगृहाणि नष्टानि, केचित् अस्वस्थाः चिकित्सालये मृत्युना सह युध्यन्ते। अन्ये च अनाहारेण कष्टं सहन्ते। बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि नदीस्रोतसा प्रवाहिताः मृताश्च ।
हिन्दी अनुवाद….हाँ हिमानी तुम सच कह रही हो। बाढ़ से घर भी नष्ट हो गये हैं। कुछ अस्वस्थ लोग चिकित्सालय में मौत से लड़ रहे हैं। दूसरे लोग भोजन न मिलाने से कष्ट सह रहे हैं। घर में पाले गये बहुत सारे पशु भी नदी के बहाव में बह गये तथा मर गये।
महोदय ! ते सम्प्रति अतिदुःखिताः भवेयुः खलु
महोदय!! वे तो अब बहुत दुखी होंगे।
सत्यम्, अशोक ! ते सर्वे अतिदुःखेन जीवन्ति । अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायता करणीया। यथा उत्कलमणिः गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवां कृत्वा अद्यापि जनमानसेषु समादृतोऽस्ति ।
हिन्दी अनुवाद….सत्य है अशोक! वे सभी अत्यधिक दुख के साथ जी रहे हैं। हम सब को भी ऐसे दुखियों की सहायता करनी चाहिये। जिस प्रकार उत्कलमणि ( उड़ीसा रत्न) गोपबन्धु दास नें बाढ़ पीड़ितों की निःस्वार्थ भाव से सेवा की और आज भी लोगों के हृदय में सम्मानित हैं।
महोदय ! एषः गोपबन्धुः कः ?
महोदय! महोदय ये गोपबन्धु कौन हैं?
भवन्तः सर्वे एतत्चित्रं पश्यन्तु। एषः अस्ति दीनबन्धुः गोपबन्धुः । सम्प्रति वयं तस्य विषये जानीमः ।

हिन्दी अनुवाद…आप सब यह चित्र देखिये… यही हैं दीनबन्धु गोपबन्धु। अब हम उनके विषय में जानेंगे।
Class 8 Sanskrit Chapter 4 Hindi Translation
एकदा आचार्यहरिहरदासः सत्यवादि-वनविद्यालयस्य सर्वान् अध्यापकान् भोजनाय आमन्त्रितवान्। आमन्त्रिताः सर्वे अतिथयः हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः । बहूनि सुस्वादूनि व्यञ्जनानि कदलीपत्रेषु परिवेषितानि। हसन् गोपबन्धुरवदत् – अरे !
भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम् ।
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु ॥

शब्दार्थ…
- एकदा =एक बार
- भोजनाय = भोजन के लिये
- आमन्त्रितवान्= बुलाया
- अतिथयः= अतिथि
- हस्तपादं = हाथ पैर
- क्षालयित्वा = धोकर
- आसनेषु=आसनों पर ( बैठने का स्थान)
- उपविष्टवन्तः= बैठ गये
- सुस्वादूनि=स्वादिष्ट
- कदलीपत्रेषु= केले पे पत्तों पर
- परिवेषितानि= परोसे गये
- अतिदौर्लभ्यं = अति दुर्लभ
हिन्दी अनुवाद..एक बार आचार्य हरिहरदास ने सत्यवादी वन विद्यालय के सभी अध्यापकों को भोजन के लिए आमंत्रित(invite)किया। आमंत्रित सभी अतिथियों ने हाथ-पैर धोकर आसनों पर बैठ गए। केले के पत्तों पर बहुत से स्वादिष्ट व्यंजन परोसे गए। हँसते हुए गोपबन्धु ने कहा— “अरे! भोजन की अत्यधिक दुर्लभता जीवन के लिए सुखदायक है। इसलिए भोजन करो, शरीर पर दया मत करो।”
एतच्छ्रुत्वा सर्वे उच्चैः हसितवन्तः । तदानीमेव बहिः कश्चन करुणध्वनिः गोपबन्धोः कर्णयोः अगुञ्जत् –
शब्दार्थ.
- एतच्छ्रुत्वा=यह सुन कर
- उच्चैः=जोर से
- बहिः= बाहर
- कश्चन=कोई
- कर्णयोः =कानों में
- अगुञ्जत् = गूँजी
हिन्दी अनुवाद..यह सुनकर सभी लोग जोर से हँस पड़े। उसी समय बाहर से किसी की करुण पुकार गोपबन्धु के कानों में गूँजी।
“मातः, मातः ! बुभुक्षितोऽस्मि, कृपया किञ्चित् भोजनं देहि। दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम् । भोजनं देहि मातः ! भोजनं देहि। आँ आँ…” इति क्रन्दनध्वनिं श्रुत्वैव दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्। किमपि अविचिन्त्य झटिति स्वस्मै परिवेषितं भोजनं हस्ते गृहीत्वा बहिरागतवान् । भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्।

- बुभुक्षित:= भूखा
- अस्मि, = हूँ
- देहि= दो
- दिनत्रयात्=तीन दिनों से
- न भुक्तम्= नहीं खाया है।
- श्रुत्वैव=सुनकर ही
- विगलित =पिघला हुआ
- अविचिन्त्य= बिना सोचे
- झटिति =तुरंत
- स्वस्मै =अपने लिये
Class 8 Sanskrit Chapter 4 Hindi Translation
हिन्दी अनुवाद..माता ! माता ! मैं भूखा हूँ। कृपया मुझे थोड़ा भोजन दे दीजिये । तीन दिनों से मैंने कुछ भी नहीं खाया है। भोजन दे दो माँ! भोजन दे दो। आँ… आँ…”
इस प्रकार रोने की आवाज सुनते ही गोपबन्धु का हृदय दया से पिघल गया और उनकी आँखों में आँसू भर आए। बिना कुछ सोचे उन्होंने तुरंत अपने लिए परोसा हुआ भोजन हाथ में लिया और बाहर आ गए। उन्होंने उस भिक्षुक को वह भोजन खिला दिया।
असौ महान् समाजसेवकः आसीत् गोपबन्धुदासः। असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य अध्यापकः, प्रसिद्धेषु पञ्चमित्रेषु अन्यतमः स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी चासीत् । ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान् । अध्ययनकालादेव स दरिद्राणां रोगिणां च सेवामकरोत्। सत्यवादि-वनविद्यालये स छात्रान् निःशुल्कम् अपाठयत्। निरक्षरतादूरीकरणाय सः सततं यतते स्म। कार्पासवस्त्रनिर्माणाय सः स्वयमेव सूत्रप्रस्तुतिमकरोत्। जन्मभूमेः दुर्दशामवलोक्य स सर्वदा चिन्ताकुलो भवति स्म। महात्मगान्धेः प्रेरणया भारतीयस्वतन्त्रतान्दोलने गोपबन्धुः भागं गृहीतवान्। सः वर्षद्वयं यावत् कारावासं प्राप्तवान् ।
शब्दार्थ..
- असौ = यह
- अन्यतमः= कोई दूसरा
- जन्म लब्धवान् = जन्म लिया
- दरिद्राणां = गरीबों का /निर्धनों का
- सततं =निरन्तर
- यतते स्म =प्रयास किया
- कार्पास =सूती / कपास
- अपाठयत् = पढ़ाया
- कारावासं =जेल
- वर्षद्व्यं =दो वर्ष
हिन्दी अनुवाद…..गोपबन्धुदास एक महान समाजसेवक थे। ये सत्यवादी वन विद्यालय के अध्यापक, प्रसिद्ध पाँच मित्रों में से एक तथा स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उनका जन्म ओडिशा राज्य के पुरी जिले में साक्षीगोपाल के पास स्थित सुआण्डो गाँव में हुआ था। अध्ययन के समय में ही उन्होंनें गरीबों और रोगियों की सेवा की । सत्यवादी वन विद्यालय में वे विद्यार्थियों को निःशुल्क पढ़ाते थे। निरक्षरता को दूर करने के लिए वे निरंतर प्रयास करते थे। सूती वस्त्रों के निर्माण के लिए वे स्वयं ही सूत तैयार करते थे।
जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर वे हमेशा चिंतित रहते थे। महात्मा गाँधी की प्रेरणा से गोपबन्धु ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। वे दो वर्षों तक कारावास में रहे ।
कारागारे निवसन् सः ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ इत्यादीनि बहुप्रेरणादायीनि पुस्तकानि ओडिआभाषया विरचितवान् । सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान्।
शब्दार्थ..
- कारागारे =जेल में
- निवसन्तः =रहते हुए
- बहुप्रेरणादायिनी = अनेक प्रेरनादायक
- विरचितवान्= रचना की
हिन्दी अनुवाद….कारागार में रहते हुए उन्होंने ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’ और ‘नचिकेता-उपाख्यान’ आदि अनेक प्रेरणादायक पुस्तकों की रचना ओड़िया भाषा में की। उन्होंने हमेशा स्वदेशी वस्त्रों और वस्तुओं का ही उपयोग किया।
मरणासन्नं स्वपुत्रमपि विहाय जलप्लावपीडितान् भारतमातुः सहस्रशः पुत्रान् उद्धर्तुं गृहात् बहिः निर्गतः समाजमसेवत च। देशसेवातत्परस्य गोपबन्धुवर्यस्य प्रसिद्धं प्रेरणादायकं वचनमधुनापि जनमानसेषु राष्ट्रभक्तिं जागरयति ।
Class 8 Sanskrit Chapter 4 Hindi Translation
शब्दार्थ..
- मरणासन्नं= मृत्यु के निकट
- विहाय = छोड़ कर
- सहस्रशः= हजारों
- उद्धर्तुं= बचाने के लिये
- गृहात् बहिः = घर से बाहर
- निर्गतः=निकल पड़े
- जागरयति= जगाता है.
अपने मरणासन्न पुत्र को भी छोड़कर जल-प्लावन ( बाढ़)से पीड़ित भारत माता के हजारों पुत्रों को बचाने के लिए वे घर से बाहर निकल पड़े और समाज की सेवा करने लगे। देशसेवा के लिए समर्पित गोपबन्धु का प्रसिद्ध प्रेरणादायक वचन आज भी लोगों के मन में राष्ट्रभक्ति को जगाता है।
स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः, स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु ।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका, ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा ।।
शब्दार्थ..
- मम= मेरा
- लीयतां=विलीन हो जाय
- तनुः = शरीर
- गर्त= गड्ढा
- मालिका= समूह
- अस्थिमांसैः = हड्डियों और मांस से
- परिपूरितास्तु= भर जाये
“स्वदेश की भूमि में मेरा शरीर विलीन हो जाए और देशवासी मेरा अनुसरण करें । स्वतंत्रता के मार्ग में जहाँ-जहाँ गड्ढे हों, वे मेरे अस्थि-मांस से भर जाएँ।”
मिशु मोर देह ए देश माटिरे, देशवासी चालि जाआन्तु पिठिरे,
देशर स्वराज्य पथे जेते गाड, पुरु तहिँ पडि मोर मांस हाड ॥
ओड़िया पंक्तियों का भाव:
“मेरा शरीर इस देश की मिट्टी में मिल जाए और देशवासी मेरे पीछे चलते जाएँ। देश के स्वराज्य के मार्ग में जहाँ कहीं भी गड्ढे हों, वहाँ मेरा मांस और मेरी हड्डियाँ भर जाएँ।”
भावार्थः –
स्वदेशस्य भूमिभागे मम शरीरं विलीनं भवतु। देशवासिनः मम अनुसरणं कुर्वन्तु । देशस्य स्वतन्त्रतानिमित्तं यत्र यत्र प्रतिबन्धकाः गर्ताः सन्ति, ते सर्वे गर्ताः मम अस्थिभिः मांसैश्च परिपूर्णाः भवन्तु ।
भावार्थ
मेरी इच्छा है कि मेरा शरीर अपने देश की भूमि में विलीन हो जाए। देशवासी मेरे बताए मार्ग का अनुसरण करें। देश की स्वतंत्रता के मार्ग में जहाँ-जहाँ बाधाओं के रूप में गड्ढे हैं, वे सभी मेरे शरीर की हड्डियों और मांस से भर जाएँ।
असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य, दरिद्रनारायणसेवा-सङ्घस्य, सत्यवादि-मुद्रणालयस्य, समाजः इति दैनिक वार्तापत्रस्य च प्रतिष्ठाता आसीत्। समाजः इति दिनपत्रिका शताधिकवर्षेभ्यः अधुनापि प्रतिदिनं प्रकाश्यते। समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागमनुभवन् वैज्ञानिकः आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान् ।
शब्दार्थ…
- वार्तापत्रस्य= समाचार पत्र के
- प्रतिष्ठाता=संस्थापक( founder)
- शताधिकवर्षेभ्यः= सौ से भी अधिक वर्षों से
- अधुनापि= आज भी
- प्रकाश्यते= प्रकाशित होते हैं।
यह गोपबन्धु , सत्यवादी वन विद्यालय, दरिद्रनारायण सेवा संघ, सत्यवादी मुद्रणालय तथा ‘समाज’ नामक दैनिक समाचार-पत्र के संस्थापक थे। ‘समाज’ नामक यह दैनिक समाचार-पत्र सौ से भी अधिक वर्षों से आज भी प्रतिदिन प्रकाशित हो रहा है।
समाजसेवा और देशसेवा के लिए उनके असीम त्याग का अनुभव करते हुए वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने गोपबन्धु को ‘उत्कलमणि’ की उपाधि से सम्मानित किया।
उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः ॥
शब्दार्थ…
- आख्यः =नाम के
- प्रणम्यो= प्रणाम
- श्लोक का हिन्दी अनुवाद….उत्कलमणि की उपाधि से प्रसिद्ध लोकसेवक महान देशभक्त गोपबन्धु को प्रणाम है।
Sanskrit Class 8 Chapter 4 Question Answer प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामना
Sanskrit Class 8 Chapter 9 Question Answer कोऽरुक्?कोऽरुक्?कोऽरुक्?