Rashtram Samrakshyamev hi class 10..राष्ट्रं संरक्ष्यमेव हि ncert समाधान सम्पूर्ण पाठ का हिन्दी अनुवाद तथा पाठ में दिये गये अभ्यास कार्य का समाधान
पाठ….राष्ट्रं संरक्ष्यमेव हि
( विद्यालये बालचराणां शिबिरम्। सायं सर्वे स्व-अनुभवान् श्रावयन्ति )
विद्यालय में बच्चों का शिविर। सायं काल में सभी बच्चे अपने अपने अनुभवों को सुनाते हैं।
ध्रुवः….विचित्रः अयं संसारः । केचन महापुरुषाः महात्मगान्धिवत् अहिंसायाः पाठं पाठयन्ति। अन्ये चआणविक अस्त्राणां निर्माणं विधाय जगतः संहारं कर्तुम् इच्छन्ति ।
ध्रुव.. यह संसार अनोखा है। कुछ महापुरुष महात्मा गाँधी के समान अहिंसा का पाठ पढ़ाते हैं, और कुछ तो परमाणु अस्त्र का निर्माण कर के संसार का विनाश करना चाहते हैं।
सिद्धार्थः..वस्तुतः विज्ञानस्य सत्प्रयोगः राष्ट्रस्य कल्याणाय, दुरुपयोगश्च विनाशाय भवति।
सिद्धार्थ.. सच कहे तो.. विज्ञान का सही प्रयोग देश की रक्षा के लिये तथा दुरुपयोग अर्थात बुरा प्रयोग विनाश के लिये होता है।
सुश्रुतः..आम्, दुरुपयोगः तु अभिशापः एव ।
सुश्रुत.. हाँ दुरुपयोग तो अभिशाप ही है।
चरकः..विदितम् अस्ति किं युष्माकं यत् प्राचीनकाले अपि आणविक अस्त्राणां मानवेषु प्रयोगः निषिद्धः आसीत्।
चरक.. क्या तुम्हें पता है कि प्राचीन समय में भी आणविक अस्त्रों का मनुष्यों पर प्रयोग निषिद्ध था.
ध्रुवः …किं पुरा अपि एतादृशानि अस्त्राणि आसन् येषां मानवेषु प्रयोगः वर्जितः आसीत् ।
ध्रुव.. क्या प्राचीन समय में भी ऐसे अस्त्र थे जिनका मनुष्यों पर प्रयोग वर्जित था।
सिद्धार्थः ….किमिदं सत्यम् ? आश्चर्यम् ।
सिद्धार्थ.. क्या यह सत्य है? आश्चर्य है।
चरकः… प्रत्यक्षं किं प्रमाणम् ? ‘राष्ट्र संरक्ष्यमेव हि’ अयं पाठः महाभारत-आधारितः। एतम् पठित्वा ज्ञास्यामः।
चरक.. प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? राष्ट्र संरक्ष्यमेव हि यह पाठ महाभारत पर आधारित है।इसे पढ़ कर ही जानेंगे।
राष्ट्रं संरक्ष्यमेव हि
Rashtram Samrakshyamev hi
(ततः पुत्रशोकसन्तप्ताः युधिष्ठिरः भीमः द्रौपदी च रणभूमौ प्रविशन्ति ।)
(तब पुत्र के शोक से दुखी द्रौपदी, युधिष्ठिर और भीमसेन रणभूमि में प्रवेश करते हैं।)
द्रौपदी..(दीर्घ निःश्वस्य) हा हन्त। किम् इदं घोरम् आपतितम्। पापकर्मणा द्रौणिना मे पुत्राः भ्रातरः च हताः। अग्निः इव दहति माम् अयं शोकः ।
द्रौपदी.. (गहरी साँस ले कर) हाय दुख है, यह कितना घोर संकट आ गया।पाप कर्म करने वाले द्रोण के पुत्र द्वारा मेरे पुत्रों और भाईयों को मार डाला गया।यह शोक मुझे आग की तरह जला रहा है।
युधिष्ठिरः..शुभे ! धैर्यं धारय। नूनं तव पुत्राः वीरगतिम् एव प्राप्ताः। वीरजननी त्वं शोचितुं न अर्हसि ।
युधिष्ठिर..हे कल्याणी ! धैर्य धारण करो। निश्चय ही तुम्हारे पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए हैं। वीरों की माता तुम शोक करने योग्य नहीं हो।
द्रौपदी..कथं मन्दभाग्या अहं धैर्य धारयामि। यावत् असौ क्रूरकर्मा न दण्ड्यते, तावत् अहम् इतः न गमिष्यामि, अत्रैव प्राणत्यागं च करिष्यामि।
द्रौपदी… मैं अभागिन कैसे धैर्य धारण करूँ। जब तक यह क्रूरकर्मी (अश्वत्थामा ) दण्डित नहीं किया जाता, तब तक मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी और यहाँ पर ही प्राण का त्याग करुँगी।
युधिष्ठिरः..प्रिये ! मा एवं ब्रूयाः। स पापकर्मा कुत्र गतः इति न जानीमः। अतिदूरं किञ्चिद् दुर्गमवनं प्रविष्टः भवेत्।
युधिष्ठिर …. प्रिये! ऐसा मत बोलो। वह पापी कहाँ गया यह नहीं जानता हूँ।बहुत दूर किसी दुर्गम वन में प्रविष्ट हो गया हो ।
द्रौपदी..(भीमं प्रति) आर्यपुत्र ! क्षत्रधर्मम् अनुस्मरन् मां शोकसागरात् रक्ष। अस्मिन् संसारे कश्चित् अपि त्वया सदृशः पराक्रमी नास्ति । पुरा वारणावते त्वमेव पाण्डवान् रक्षितवान्। विराट-नगरे अपि त्वं मां प्राणङ्कटात् उद्घृतवान् ।
द्रौपदी… (भीम की ओर देख कर ) आर्य पुत्र! क्षत्रिय धर्म का स्मरण करते हुए शोक सागर से मेरी रक्षा करिये। इस संसार में कोई भी आपके समान पराक्रमी नहीं है। पहले वारणावत में तुमने ही पाण्डवों की रक्षा की थी। विराट नगर में भी तुमने मुझे प्राण संकट से बचाया था।
भीमः..(युधिष्ठिरं प्रति) भ्रातः ! द्रौणिम् अनुगन्तुं मह्यम् अनुमतिं ददातु भवान् ।
भीम…(युधिष्ठिर की ओर ) भ्राता! द्रौणी का पीछा करने के लिए आप मुझे अनुमति दीजिए।
युधिष्ठिरः..गच्छ वत्स ! विजयी भव, नकुलः तव सारथिः भवतु ।(भीमसेनः निर्गच्छति, श्रीकृष्णः अर्जुनेन सह प्रविशति ।)
जाओ पुत्र विजयी हो, नकुल तुम्हारा सारथी हो।( भीमसेन निकलते हैं, श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ प्रवेश करते हैं )
श्रीकृष्णः…भो धर्मराज ! समीचीनं न कृतं भवता। पुत्रशोकविह्वलः भीमसेनः एकाकी एव द्रौणिं हन्तुम् अभिधावति।
श्रीकृष्ण…हे धर्मराज! आपनें उचित नहीं किया। पुत्रशोक से दुखी भीमसेन अकेला ही अश्वत्थामा को मारने के लिये उसका पीछा कर रहा है।
युधिष्ठिरः..भगवन् ! सः तु एकाकी एव द्रोणपुत्राय अलम् ।
युधिष्ठिर.. भगवन! वह तो अकेला ही द्रोण पुत्र अश्वत्थामा के लिये पर्याप्त है।
श्रीकृष्णः..वत्स ! न जानाति भवान् द्रौणेः चपलां प्रकृतिम्। पितुः द्रोणात् प्राप्तं ब्रह्मशिरो नाम अस्त्रं विद्यते तस्य पार्श्वे। यदि तत् प्रयुज्यते, सर्वा पृथ्वी दग्धा स्यात्
श्रीकृष्ण… पुत्र! आप द्रोण पुत्र के चञ्चल स्वभाव को नहीं जानते हैं। उसके पास पिता द्रोण से प्राप्त ब्रह्मशिरा नाम का अस्त्र है। यदि उसका प्रयोग होता है तो सारी पृथ्वी भस्म हो सकती है।
युधिष्ठिरः….अप्येवम् ! आचार्येण कीदृशः अनर्थः कृतः ? किं चपलबालकेभ्यः एतादृश-भीषणानाम् अस्त्राणां प्रदानम् उचितम् ?
युधिष्ठिर … क्या ऐसा है? आचार्य जी के द्वारा ये कैसा अनर्थ कर दिया गया है?
श्रीकृष्णः….शृणु तावत्, आचार्येण तु प्रियशिष्याय अर्जुनाय एव प्रीत्या मनसा ब्रह्मास्त्रशिक्षा प्रदत्ता किन्तु पुत्रप्रेमपराधीनेन तेन अश्वत्थामा अपि तच्छिक्षया वञ्चितः न कृतः ।
श्रीकृष्ण… तो सुनिये.. आचार्य नें तो प्रिय शिष्य अर्जुन को ही प्रसन्नता से मन से ब्रह्मास्त्र की शिक्षा दी थी परन्तु पुत्र प्रेम के वश में हो कर उन्होंनें अश्वत्थामा को भी उस शिक्षा से वञ्चित नहीं किया।
अर्जुनः ….अपरं च, अस्त्रशिक्षाप्रदानात् पूर्वम् आचार्यः पुत्रं सावधानम् अकरोत् यत्-
अर्जुन.. और दूसरी बात.. कि अस्त्र शिक्षा देने के पूर्व आचार्य जी नें पुत्र को सावधान भी किया था कि…
परमापद्गतेनापि नैव तात त्वया रणे।
इदमस्त्रं प्रयोक्तव्यं मानुषेषु विशेषतः ॥ 1 ॥
अन्वय… तात्! परम -आपद् -गतेन अपि त्वया रणे इदम् अस्त्रम् विशेषतः मानुषेषु न एव प्रयोक्तव्यं।
श्लोकार्थ… हे पुत्र ! बड़ी से बड़ीआपदा आने पर भी तुम्हें रणभूमि में इस अस्त्र का प्रयोग विशेष रूप से मनुष्यों पर नहीं करना चाहिये।
युधिष्ठिरः..सम्प्रति आश्वस्तः अस्मि । मन्ये सः ब्रह्मास्त्रप्रयोगं न करिष्यति ।
युधिष्ठिर.. अब मैं आश्वस्त हूँ, कि वह ब्रह्मास्त्र का प्रयोग नहीं करेगा।
श्रीकृष्णः..तर्हि न जानासि तस्य मनोवृत्तिम्। पितुः उपदेशेन असन्तुष्टः स एकदा द्वारकापुरीम् आगच्छत् । ब्रह्मास्त्रं दत्त्वा सः सुदर्शनचक्रम् अवाञ्छत् ।
श्रीकृष्ण…तो तुम उसकी मानसिक प्रवृत्ति को नहीं जानते हो.। पिता के इस उपदेश से दुखी हो कर वह एक बार द्वारका आया था।ब्रह्मास्त्र को दे कर मुझसे सुदर्शन चक्र चाहता था।
युधिष्ठिरः..(साश्चर्यम्) कथं चक्रम् इति!
युधिष्ठिर.. (आश्चर्य से ) क्या चक्र चाहता था?
श्रीकृष्णः….आम् ! मया कथितम्। नाहं त्वत्तः ब्रह्मास्त्रम् इच्छामि। यदि त्वं मम गदां, शक्तिं, धनुः,चक्रं वा इच्छसि, तुभ्यं ददामि ।
श्रीकृष्ण… हाँ! मैनें कहा — मैं तुमसे ब्रह्मास्त्र नहीं लेना चाहता हूँ। यदि तुम मेरी गदा ,शक्ति धनुष या चक्र चाहते हो, तो मैं तुम्हें देता हूँ।
युधिष्ठिरः….ततस्ततः ।
युधिष्ठिर… तब तब। (अर्थात फिर क्या हुआ?)
श्रीकृष्णः..सः तु चक्रम् एव अयाचत । गृहाण चक्रम् इति उक्तः सः सव्येन पाणिना चक्रं गृहीतवान्, किन्तु सः तत् चक्रं स्वस्थानात् सञ्चालयितुम् अपि समर्थः न अभवत् ।
श्रीकृष्ण… उसने तो चक्र ही माँगा। चक्र ले लो इस प्रकार मेरे कहे जाने पर उसने बाएँ हाथ से चक्र ले लिया किन्तु वह उस चक्र को अपने स्थान से चलाने में समर्थ नहीं हुआ। (अर्थात वह चक्र को चला नहीं सका )
युधिष्ठिरः…जानीमः भवतः दिव्यां शक्तिम् ।
युधिष्ठिर… आपकी दिव्य शक्ति को जानता हूँ.
श्रीकृष्णः ..तदा अहं नैराश्येन खिन्नं द्रौणिं पृष्टवान्, ‘वत्स ! किमर्थं त्वम् इदं दिव्यं चक्रं वाञ्छसि ?’
श्रीकृष्ण …तब मैनें निराशा से दुखी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा से पूछा — तुम इस दिव्य चक्र को किस लिये चाहते हो?
युधिष्ठिरः ..किम् उक्तं तेन ?
युधिष्ठिर…उसने क्या कहा?
श्रीकृष्णः ..सः प्रत्यवदत्-
प्रार्थितं ते मया चक्रं देवदानवपूजितम् ।
अजेयः स्यामिति विभो ! सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ 2 ॥
अतोऽहं ब्रवीमि, तस्मिन् चञ्चले क्रूरे च द्रोणपुत्रे न विश्वसितव्यम् ।
श्लोक अन्वय… विभो!अजेयः स्याम् इति मया देवदानव-पूजितम् चक्रं ते प्रार्थितम्। एतत् ते सत्यं ब्रवीमि।
श्रीकृष्ण… उसने कहा — हे भगवन! देवों और दानवों द्वारा पूजे जाने वाले इस चक्र को प्राप्त कर के मैं अजेय हो जाऊँ, इस लिये मैनें यह चक्र आपसे माँगा है।
इसीलिये मैं कहता हूँ कि उस चञ्चल और क्रूर द्रोण पुत्र पर विश्वास मत करो
(ततः युधिष्ठिरार्जुनौ श्रीकृष्णेन सह रथारोहणं नाटयतः ।)
(तब युधिष्ठिर और अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ रथ पर चढ़ने का नाटक करते हैं।)
अश्वथामा ….रे दुष्ट भीम ! त्वम् अद्य वध्योऽसि मया। (विलोक्य) अये कथं श्रीकृष्णार्जुनौ युधिष्ठिरश्च ? (स्वगतम्) इदानीं किं करवाणि ? आः दृष्टम्, अस्मिन् विषमे समये ब्रह्मास्त्रम् एव मे शरणम्। मोचयामि अस्त्रम् । (ध्यानं नाटयति ब्रवीति च) इदम् अपाण्डवाय ।
अश्वथामा..रे दुष्ट भीम! आज तुम मेरे द्वारा मार दिये जाओगे। (देख कर ) अरे श्रीकृष्ण युधिष्ठिर और अर्जुन ! कैसे? (मन में) अब मैं क्या करुँ? ओ समझ गया , इस कठिन समय में ब्रह्मास्त्र ही मेरा सहारा है।मैं ब्रह्मास्त्र को छोड़ता हूँ। (ध्यान का अभिनय करता है और बोलता है) –यह पाण्डवों के विनाश के लिये ।
श्रीकृष्णः ..पार्थ पश्य, पश्य। एतद् विमुच्यते ब्रह्मास्त्रं द्रोणपुत्रेण! त्रैलोक्यं दहन् इव प्रचण्डज्वालः अग्निः परितः प्रसरति । अर्जुन ! अर्जुन ! त्वमपि मुञ्च ब्रह्मास्त्रं एतत् निवारयितुम् ।
श्रीकृष्ण.. पार्थ देखो देखो। द्रोण पुत्र ब्रह्मास्त्र छोड़ रहा है। तीनों लोकों को जलाती हुई प्रचण्ड लपटों वाली अग्नि सब चारो ओर फैल रही है। अर्जुन! तुम भी इसे रोकने के लिये ब्रह्मास्त्र छोड़ो।
अर्जुनः ..नमः भगवते। स्वस्ति आचार्यपुत्राय, स्वस्ति मे भ्रातृभ्यः । उत्सृज्यते मया ब्रह्मास्त्रम्। अस्त्रम् अस्त्रेण शाम्यताम् ।
अर्जुन.. भगवान को प्रणाम। आचार्य पुत्र का कल्याण हो , मेरे भाईयों का कल्याण हो। मेरे द्वारा ब्रह्मास्त्र को छोड़ा जा रहा है। अस्त्र द्वारा अस्त्र को शान्त किया जाय।
(ततः प्रविशतः व्यासनारदौ) (तभी व्यास और नारद प्रवेश करते हैं )
नारदः…(व्यासं प्रति) पश्यतु भवान्। कोऽयम् अनर्थः क्रियते एताभ्यां वीराभ्याम्। समन्तात् वर्धमानाः प्रचण्डानलशिखाः आकाशं लिहन्ति इव। गगनात् सहस्रशः उल्काः भूमौ पतन्ति। कम्पते खलु सपर्वत-वन-द्रुमा सकला मही। पवनः स्तब्धः जातः। सहस्त्रांशुः न भासते। शैलाः विदीर्यन्ते। कथमपि एतौ निवारणीयौ, अन्यथा सकलं जगद् ध्वस्तं भविष्यति ।
नारद… (व्यास की ओर ) आप देखिये। इन दो वीरों के द्वारा क्या अनर्थ किया जा रहा है। चारो ओर बढ़ती हुई तेज आग की लपटें मानो आकाश को छू रही हैं। आकाश से सहस्रों (हजारों) उल्काएं भूमि पर गिर रही हैं। पर्वतों वनों और वृक्षों सहित यह सम्पूर्ण पृथ्वी काँप रही है। वायु रुक गई है। सूर्य चमक नहीं रहा है।पर्वत फट रहे हैं। किसी भी प्रकार इन्हें रोका जाना चाहिये, अन्यथा सारा संसार ध्वस्त हो जायेगा।
व्यासनारदौ..भो वीरौ ! संहरतम् संहरतम् निजास्त्रे ।
व्यास नारद.. हे दोनों वीरों! अपने अपने अस्त्र को रोक लो।
नारदः …
नानाशस्त्रविदः पूर्वे येऽप्यतीता महारथाः ।
नैतदस्त्रं मनुष्येषु तैः प्रयुक्तं कथञ्चन ॥ 3 ॥
अन्वय… नाना शास्त्रविदः ये अपि पूर्वे महारथाः अतीताः तैः एतद् अस्त्रं मनुष्येषु न कथञ्चन प्रयुक्तं।।3।।
नारद… 3…श्लोकार्थ पहले भी जो अनेक अस्त्रों के ज्ञाता महारथी हुए हैं, उनके द्वारा भी यह अस्त्र मानवों पर किसी प्रकार भी प्रयोग नहीं किया गया।
अस्त्रं ब्रह्मशिरो यत्र परमास्त्रेण वध्यते ।
समाः द्वादश पर्जन्यस्तद् राष्ट्र नाभिवर्षति ॥ 4 ॥
अन्वय.. यत्र ब्रह्मशिरः अस्त्र परमस्त्रेण बध्यते , पर्जन्यः द्वादशसमाः तद् राष्ट्रं न अभिवर्षति।।4।।
4..श्लोकार्थ…..जहाँ ब्रह्मास्त्र को दूसरे महान अस्त्र से रोका या नष्ट किया जाता है उस राष्ट्र में बारह (12) वर्ष तक बादल नहीं बरसते हैं।
अर्जुनः…(बद्धाञ्जलिः भूत्वा) भगवन्! मया तु अस्त्रम् अस्त्रेण शाम्यताम् इति कृत्वा अस्त्रं विमुक्तम्। तत् च मया संह्रियते। परन्तु द्रौणेः अस्त्रम् अस्मान् सर्वान् प्रधक्ष्यति एव ।
अर्जुन..(हाथ जोड़ कर) भगवन! अस्त्र से अस्त्र शान्त हो जाय यह विचार कर मेरे द्बारा अस्त्र छोड़ा गया था।वह तो मेरे द्वारा रोक लिया जायेगा, परन्तु अश्वत्थामा का अस्त्र तो हम सब को जला देगा
व्यासः…(द्रौणिं प्रति) अयि द्रोणपुत्र ! त्वम् अपि निज-अस्त्रं संहर येन सर्वनाशो न भवेत्।
पाण्डवास्त्वं च राष्ट्र च सदा संरक्ष्यमेव हि।
तस्मात् संहर दिव्यं त्वमस्त्रमेतन्महाभुज ।॥ 5 ॥
अन्वय.. पाण्डवाः त्वम् च राष्ट्रं च सदा संरक्ष्यम् एव हि ,. (हे) महाभुज्! तस्मात् त्वम् एतत् दिव्यं अस्त्रं संहर।
व्यास..(अश्वत्थामा की ओर देख कर कहते हैं ) हे द्रोण पुत्र ! तुम भी अपना अस्त्र लौटा (वापस कर) लो जिससे सर्वनाश न हो।
पाण्डवों को( कहते हैं) और तुम्हें सदा राष्ट्र की रक्षा करनी ही चाहिये। इस लिये हे महाबाहु! तुम यह अस्त्र लौटा लो।
राष्ट्रं संरक्ष्यमेव हि
Rashtram Samrakshyamev hi पाठ आधारित अभ्यास कार्य..
1..अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत-
(क) द्रौपद्याः पुत्राः केन हताः ?
उत्तर.. द्रौणिना/द्रोणपुत्रेण।
(ख) वारणावते पाण्डवान् कः अरक्षत् ?
उत्तर.. भीमः।
(ग) नकुलः कस्य सारथिः अभवत् ?
उत्तर…भीमस्य।
(घ) आपद्गतेन अपि ब्रह्मास्त्रं केषु न प्रयोक्तव्यम् ?
उत्तर… मानुषेषु।
(ङ) अश्वत्थामा श्रीकृष्णं किम् अयाचत ?
उत्तर.. चक्रम्।
(च) आकाशात् काः पतन्ति स्म?
उत्तर..उल्काः
(छ) कः न भासते स्म ?
उत्तर… सहस्रांशुः।
2…पूर्णवाक्येन उत्तरं लिख्यताम् –
(क) द्रोणाचार्यः प्रीतः भूत्वा कं ब्रह्मास्त्रम् अशिक्षयत् ?
उत्तर..द्रोणाचार्यः प्रीतः भूत्वा अर्जुनम् ब्रह्मास्त्रम् अशिक्षयत्।
(ख) अश्वत्थामा केषां विनाशाय ब्रह्मास्त्रं मोचयति ?
उत्तर..अश्वत्थामा पाण्डवानाम् विनाशाय ब्रह्मास्त्रं मोचयति।
(ग) भीमसेनः नकुलेन सह कम् अनुगच्छति ?
उत्तर..भीमसेनः नकुलेन सह द्रोणिं/ द्रोणपुत्रं अनुगच्छति।
(घ) द्रोणपुत्रः श्रीकृष्णात् किं वाञ्छति स्म ?
उत्तर..द्रोणपुत्रः श्रीकृष्णात् सुदर्शनचक्रम् वाञ्छति स्म।
(ङ) ‘अस्त्रं संहरतम्’ इति कौ वदतः ?
उत्तर..’अस्त्रं संहरतम्’ इति वयसनारदौ वदतः।
(च) ब्रह्मास्त्रस्य निषेधेन के के संरक्ष्याः सन्ति ?
उत्तर..ब्रह्मास्त्रस्य निषेधेन पाण्डवाः, द्रौणिः राष्ट्रं च संरक्ष्याः सन्ति
3…रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
- (क) पापकर्मणा द्रौणिना मे पुत्राः हताः ।
- (ख) अस्मिन् संसारे कश्चिदपि त्वया सदृशः नास्ति ।
- (ग) न जानाति भवान् द्रौणेः चपलां प्रकृतिम्।
- (घ) आचार्यः पुत्रं सावधानम् अकरोत् ।
- (ङ) प्रचण्डज्वालः अग्निः परितः प्रसरति ।
- (च) गगनात् सहस्रशः उल्काः भूमौ पतन्ति ।
उत्तर
- (क) पापकर्मणा द्रौणिना कस्याः पुत्राः हताः ।
- (ख) कुत्र कश्चिदपि त्वया सदृशः नास्ति ।
- (ग) न जानाति भवान् कस्य चपलां प्रकृतिम्।
- (घ) कः पुत्रं सावधानम् अकरोत् ।
- (ङ) कीदृशः अग्निः परितः प्रसरति ।
- (च) गगनात् सहस्रशः काः भूमौ पतन्ति
4…अधोलिखितप्रश्नान् यथानिर्देशम् उत्तरत
(क) ‘युधिष्ठिरः, भीमः द्रौपदी च रणभूमौ प्रविशन्ति।’ अस्मिन् वाक्ये क्रियापदं किम् ?
उत्तर..प्रविशन्ति।
(ख) ‘वीरजननी त्वं शोचितुं न अर्हसि ।’ अत्र किं कर्तृपदम् अस्ति ?
उत्तर..त्वम्।
(ग) ‘आचार्येण कीदृशः अनर्थः कृतः ?’ अस्मिन् वाक्ये किं विशेष्यपदं प्रयुक्तम् ?
उत्तर..अनर्थः।
(घ) ‘गगनात् सहस्रशः उल्काः भूमौ पतन्ति ।’ अस्मिन् वाक्ये ‘धरायाम्’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम् ?
उत्तर..भूमौ।
(ङ) ‘सकलं जगद् ध्वस्तं भविष्यति ।’ अस्मिन् वाक्ये विशेषणपदं किम् ?
उत्तर.. सकलं।
(च) ‘अस्त्रशिक्षाप्रदानात् पूर्वम् आचार्यः पुत्रं सावधानम् अकरोत्।’ अत्र ‘पश्चात्’ इति पदस्य किं विलोमपदं
उत्तर…. पूर्वम्
5…विशेषणानां विशेष्यैः सह मेलनं क्रियताम्-
- (क) सव्येन………..चक्रम्
- (ख) पापकर्मणा………समये
- (ग) देवदानवपूजितम्…..उल्काः
- (घ) सकला……….द्रौणिना
- (ङ) सहस्रशः…….पाणिना
- (च) विषमे………मही
उत्तर..
- (क) सव्येन……….पाणिना
- (ख) पापकर्मणा………द्रौणिना
- (ग) देवदानवपूजितम्….. चक्रम्
- (घ) सकला……….मही
- (ङ) सहस्रशः……. उल्काः
- (च) विषमे………समये
6…अधोलिखितेषु पदेषु यत् पदम् अर्थदृष्ट्या भिन्नं तं रेखाङ्कित्तं कुरुत ।
यथा पर्जन्यः, पयोदः, वारिधरः, पयोधिः ।
- (क) सहस्त्रांशुः, हिमांशुः, दिनकरः, भानुः ।
- (ख) वृक्षाः, द्रुमाः, महीधराः, महीरुहाः ।
- (ग) पवनः, अनिलः, अनलः, वायुः ।
- (घ) शैलाः, भूधराः, खेचराः, पर्वताः ।
- (ङ) नरः, मनुष्यः, पन्नगः, मानवः ।
उत्तर…
- (क) सहस्त्रांशुः, हिमांशुः, दिनकरः, भानुः ।
- (ख) वृक्षाः, द्रुमाः, महीधराः, महीरुहाः ।
- (ग) पवनः, अनिलः, अनलः, वायुः ।
- (घ) शैलाः, भूधराः, खेचराः, पर्वताः ।
- (ङ) नरः, मनुष्यः, पन्नगः, मानवः ।
7..श्लोकमाश्रित्य समुचितक्रमेण अन्वयं पूग्यत-
- (क) तात ! परम-आपद्गतेन……….त्वया रणे इदम्……….विशेषतः…….न एव……..।
- (ख) नाना….. ये अपि पूर्वे महारथाः ….. तैः….अस्त्रम्…….न कथञ्चन प्रयुक्तम् ।
- (ग)…….त्वम् च राष्ट्रम् च…….संरक्ष्यम् एव हि, ……! तस्मात् त्वम्……… दिव्यम् अस्त्रम् संहर ।
उत्तर….
- (क) तात ! परम-आपद्गतेन……अपि ….त्वया रणे इदम्…..अस्त्रम्…..विशेषतः…मानुषेषु ….न एव…प्रयोक्तव्यं…..।
- (ख) नाना..शास्त्रविदः …. ये अपि पूर्वे महारथाः ..अतीताः… तैः.एतद्…..अस्त्रम्….मनुष्येषु …न कथञ्चन प्रयुक्तम् ।
- (ग)..पाण्डवाः …..त्वम् च राष्ट्रम् च….सदा …संरक्ष्यम् एव हि, ….महाभुज्....! तस्मात् त्वम्…एतद्…… दिव्यम् अस्त्रम् संहर ।
8..अधोलिखितानि वाक्यानि घटनाक्रमानुसारं पुनः लिखत-
- (क) इदं दृष्ट्वा अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्रं मुञ्चति ।
- (ख) एतम् अनर्थं दृष्ट्वा नारदव्यासौ तत्रागच्छतः ।
- (ग) युधिष्ठिरः भीमं नकुलेन सह द्रौणिम् अनुगन्तुं कथयति ।
- (घ) द्रौणिना द्रौपद्याः भ्रातरः पुत्राः च हताः ।
- (ङ) इदं दृष्ट्वा अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्रं मुञ्चति ।
- (च) तौ विश्वस्य संरक्षणार्थं दिव्यम् अस्त्रं संहर्तुम् कथयतः ।
- (छ) श्रीकृष्णः युधिष्ठिरार्जुनाभ्यां सह युद्धक्षेत्रं गच्छति ।
- (ज) द्रौपदी द्रौणपुत्रं दण्डयितुं कथयति ।
उत्तर…
- द्रौणिना द्रौपद्याः भ्रातरः पुत्राः च हताः ।
- द्रौपदी द्रौणपुत्रं दण्डयितुं कथयति ।
- युधिष्ठिरः भीमं नकुलेन सह द्रौणिम् अनुगन्तुं कथयति ।
- श्रीकृष्णः युधिष्ठिरार्जुनाभ्यां सह युद्धक्षेत्रं गच्छति ।
- इदं दृष्ट्वा अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्रं मुञ्चति ।
- एतम् अनर्थं दृष्ट्वा नारदव्यासौ तत्रागच्छतः ।
- तौ विश्वस्य संरक्षणार्थं दिव्यम् अस्त्रं संहर्तुम् कथयतः ।
9..रेखाङ्कित्तपदेषु प्रसङ्गानुसारम् उचितम् अर्थचयनं कुरुत –
- (क) किम् इदं घोरम् आपतितम् ।
- (i) पत्रम् (ii) भयङ्करम् (iii) दायित्त्वम्
उत्तर..भयङ्करम्
- (ख) समीचीनं न कृतं भवता।
- (i) घृणितम् (ii) वञ्चनम् (iii) उचितम्
उत्तर… उचितं
- (ग) पवनः स्तब्धः जातः ।
- (i) आरब्धः (ii) स्थगितः (iii) प्रदूषितः
उत्तर..स्थगितः
- (घ) सकलं जगत् ध्वस्तं भविष्यति ।
- (i) समस्तम् (ii) ईश्वरीयम् (iii) अर्धम्
उत्तर…समस्तम्
- (ङ) द्वादश समाः पर्जन्यः तद् राष्ट्रं नाभिवर्षति ।
- (i) मासाः (ii) वर्षाणि (iii) दिनानि
उत्तर…वर्षाणि
- (च) पर्जन्यः द्वादश समाः तद् राष्ट्रं नाभिवर्षति।
- (i) इन्द्रः (ii) शक्रः (iii) मेघः
उत्तर…मेघः
शब्दार्थ…
निःश्वस्य-गहरी सांस लेकर। द्रौणिना=द्रोणपुत्र के द्वारा। हुताशनः=अग्नि। शोचितुम्=शोक करने के लिए। न अर्हसि=योग्य नहीं हो। शुभे= हे कल्याणि ! न दण्ड्यते=दण्ड नहीं दिया जाता। मा एवं ब्रूयाः= ऐसा न कहें। आर्यपुत्र=हे स्वामी। अनुस्मरन्=बार-बार स्मरण करते हुए। उद्धृतवान्=उद्धार किया।
शब्दार्थ-अनुमतिम् ददातु =अनुमति दीजिए। अनुगच्छामि =अनुसरण करता हूँ। निर्गच्छति=निकलता है। द्रौणिम्=द्रोण पुत्र अश्वत्थामा को। चपलाम्=चंचल। प्रकृतिम् =स्वभाव को। पाश्र्वे=पास में । प्रयुज्यते=प्रयोग किया जाता है। दग्धा=-दग्ध।तच्छिक्षया=उस शिक्षा से। वञ्चितः =रहित ।..परम -आपद् -गतेन=बड़ी से बड़ी आपदा आने पर भी , रणे = युद्ध में , न प्रयोक्तव्यं = नहीं प्रयोग करना चाहिये।
आश्वस्तः=विश्वास युक्त, निश्चिन्त। मन्ये=मैं मानता हूँ। मनोवृत्तिम्=मानसिक प्रवृत्ति को। असन्तुष्टः=सन्तुष्ट न होकर। माम्=मुझे। चक्रम्=चक्र की। अवाञ्छत्= चाहता था । ददामि =देता हूँ।
सव्येन=बायें। पाणिना=हाथ से। गृहीतवान्= पकड़ लिया। स्थानात्=अपने स्थान से। संचालयितुम्=हिलाने के लिए। नैराश्येन=निराशा से। खिन्नम्=दुखी या व्याकुल
देवदानवपूजितम्=देवताओं तथा राक्षसों द्वारा पूजा गया। ‘अजेयः स्याम्’= मैं दूसरों द्वारा न जीते जाने योग्य बन जाऊँ अर्थात मुझे कोई हरा न सके ।इति=इस भावना से। विभो=हे संसार के स्वामी। इच्छति स्म=चाहता था। तस्मात्=उस से। रक्ष्यः= रक्षा के योग्य।
नाटयतः = अभिनय करते हैं। वध्यः = वध के योग्य । विलोक्य = देख कर ।स्वागतम्= मन में।मोचयामि=छोड़ता हूँ। अपाण्डवाय=पाण्डवों के विनाश के लिए। विमुच्यते=छोड़ा जा रहा है। दहन् इव=मानो जलाता हुआ। प्रसरति =फैल रहा है। निवारयितुम्=रोकने के लिए। उत्सृज्यते=छोड़ा जा रहा है। शाम्यताम्=शान्त कर दिया जाए।
एताभ्यां वीराभ्याम्=इन दो वीरों से। अनर्थः=अर्थहीन कार्य, विनाश। समन्ततः = चारो ओर से , वर्धमाना =बढ़ती हुई ।ज्वाला-मालाकुल:= आग की लपटों के समूह से व्याकुल । लिहन्ति = छू रही हैं ।उल्काः= जलते हुए तारे/उल्कापिण्ड। कंपतं = काँप रही है।सकला =सम्पूर्ण , मही =पृथ्वी ,सहस्रांशु=सूर्य। न भासते = नहीं चमक रहा है।विदीर्यन्ते=फटे जा रहे हैं। निवारणीयौ = रोक लिये जायें, संहरतम्=रोको । नानाशस्त्रविदः- अनेक शस्त्रों को जानने वाला।
ब्रह्मशिरः अस्त्रं = ब्रह्मास्त्र । वध्यते=मारा जाता है, नष्ट किया जाता है। तत् राष्ट्रम्=उस राष्ट्र में। समाः-=वर्ष पर्जन्य:= बादल, न अभिवर्षति=नहीं बरसता।
बद्धाञ्जलिः भूत्वा =दोनों हाथ जोड़कर। शाम्यताम्=शान्त कर दिया जाए। विमुक्तम्=छोड़ा गया था। संहृयते=समेटा जा रहा है या रोका जा रहा है । प्रधक्ष्यति=दग्ध कर देगा/ जला देगा । संरक्ष्यम्=संरक्षण के योग्य। तस्मात्=इस कारण से , संहर = लौटा लो /रोक लो।
संधि कार्य….
- अत्रैव = अत्र +एव (वृद्धि संधि)
- कश्चित्=कः +चित् (विसर्ग संधि )
- किञ्चिद् =किम् + चित् (परसवर्ण संधि)
- अप्येवम् = अपि + एवम् (यण संधि)
- निर्गच्छति =निः +गच्छति (विसर्ग संधि)
- ब्रह्मास्त्र = ब्रह्म +अस्त्र (दीर्घ संधि)
- गतेनापि =गतेन +अपि (दीर्घ संधि)
- नैव =न +एव (वृद्धि संधि)
- तच्छिक्षया= तत् +शिक्षया (छत्व संधि )
- ततस्ततः =ततः +ततः (विसर्ग संधि )
- मनोवृत्तिम् =मनः +वृत्तिम् (विसर्ग संधि)
- नाहम् = न +अहम् (दीर्घ स्वर संधि )
- प्रत्यवदत् =प्रति +अवदत् (यण संधि)
- अतोऽहम् +अतः +अहम् (विसर्ग संधि)
- चञ्चले =चम् +चले ( परसवर्ण संधि)
- दिव्यां शक्तिं =दिव्याम् +शक्तिं ( अनुस्वार संधि )
- वध्योऽसि=वध्यः +असि (विसर्ग संधि)
- रथारोहणम् =रथ +आरोहणम् (दीर्घ संधि)
- प्रचण्डानल =प्रचण्ड +अनल (दीर्घ संधि)
- कोऽयम्=कः +अयम् ( (विसर्ग संधि)
- कथञ्चन =कथम् +चन (परसवर्ण संधि)
- नाभिवर्षति=न +अभिवर्षति (दीर्घ संधि)
- नैतदस्त्रम् =न +एतत् +अस्त्रम् ( वृद्धि संधि तथा जश्त्व संधि )
- येऽप्यतीता =ये +अपि +अतीता (पूर्वरूप संधि तथा यण संधि )
- परमास्त्रेण =परम +अस्त्रेण (दीर्घ संधि)
- पर्जन्यस्तद् =पर्जन्यः +तद् (विसर्ग संधि)
- बद्धाञ्जलिः =बद्ध +अञ्जलिः (दीर्घ संधि)
- पाण्डवास्त्रम् =पाण्डव +अस्त्रम् (दीर्घ संधि)
समास कार्य…
- वीरगतिम् = वीराणाम् गतिम् (षष्ठी तत्पुरुष)
- वीरजननी =वीराणाम् जननी (षष्ठी तत्पुरुष)
- क्रूरकर्मा = क्रूरं कर्म यस्य सः (बहुब्रीहि समास)
- प्राणत्यागम् = प्राणानाम् त्यागम् (षष्ठी तत्पुरुष)
- अनर्थः = न अर्थः (नञ् तत्पुरुष)
- प्रियशिष्याय = प्रियाय शिष्याय (कर्मधारय)
- असंतुष्टः =न संतुष्टः (नञ् तत्पुरुष)
- सव्यपाणिना =सव्येन पाणिना (कर्मधारय)
- मनोवृत्तिम = मनसः वृत्तिम् (षष्ठी तत्पुरुष)
- साश्चर्यम् =आश्चर्येण सह (तृतीया तत्पुरुष)
- ब्रहमास्त्रप्रयोगम् =ब्रहमास्त्रस्य प्रयोगम् (षष्ठी तत्पुरुष)
- अजेयः =न जेयः (नञ् तत्पुरुष)
- देवदानवपूजितम् =देवैः दानवैः च पूजितम् (तृतीया तत्पुरुष)
- दिव्यं चक्रं = दिव्यचक्रम( कर्मधारय)
- युधिष्ठिरार्जुनौ =युधिष्ठिरः च अर्जुनः च (द्वन्द्व समास)
- रथारोहणम् = रथे आरोहणम् (सप्तमी तत्पुरुष)
- परमास्त्रेण = परमेण अस्त्रेण (कर्मधारय )
- व्यासनारदौ= व्यासः च नारदः च (द्वन्द्व समास)
- सहस्रांशुः = सहस्रशः अंशवः यस्य सः (बहुब्रीहि)
- बद्धाञ्जलिः = बद्धा अञ्जलिः यस्य सः (बहुब्रीहि)
- महाभुज = महान्तौ भुजौ यस्य सः (बहुब्रीहि)
- सर्वनाशः =सर्वेषां नाशः ( षष्ठी तत्पुरुष)
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