वेदान्त दर्शन में स्थूल सृष्टि के निर्माण की एक विशिष्ट प्रक्रिया है। सृष्टि की रचना को समझाने के लिए वेदान्त दर्शन में एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त बताया गया है, जिसे पञ्चीकरण प्रक्रिया कहा जाता है। यह प्रक्रिया बताती है कि सूक्ष्म तत्त्व किस प्रकार मिलकर स्थूल जगत का निर्माण करते हैं।
पञ्चीकरण क्या है?
सृष्टि के विकास हेतु जब पाँच सूक्ष्म तत्त्व (तन्मात्राएँ) —
आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी — आपस में मिलते हैं और स्थूल रूप धारण करते हैं, तो इस मिलाने की प्रक्रिया को पञ्चीकरण कहा जाता है।
आकाश,तेज,वायु,जल और पृथ्वी ये पांच तन्मात्राएं हैं और जब इनका परस्पर समिश्रण हो जाता है तो ये महाभूत बन जाते हैं।
👉जब तक ये अलग अलग रहते हैं और पञ्चीकृत नहीं किये जाते हैं, तब तक ये सूक्ष्म तन्मात्रा कहे जाते हैं।
👉जब ये आपस में मिल् जाते हैं तब स्थूल महाभूत बना जाते हैं।
ये पञ्च महाभूत स्थूल शरीर को उत्पन्न करने वाले घटक हैं। आकाश आदि पञ्च तन्मात्राओं के संयोग से स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति होती है।
अतः स्थूल महाभूतों में प्रत्येक सूक्ष्म तन्मात्रा के गुण के अतिरिक्त अन्य तन्मात्राओं के भी गुण होते हैं।
स्थूलभूत क्या हैं…
इसके लिये वेदान्त में लिखा गया है..स्थूलभूतानि तु पञ्चीकृतानि..अर्थात स्थूलभूत पञ्चीकृत किये गये महाभूतों को कहते हैं।
अपञ्चीकृत भूत सूक्ष्म स्वरूप हैं। इनसे विकसित जड़ प्रकृति स्थूल स्वरूप प्राप्त करती है। यही अवस्था पञ्चीकृत अवस्था है।
सूक्ष्म और स्थूल का अंतर
- अपञ्चीकृत भूत → सूक्ष्म अवस्था (अदृश्य)
- पञ्चीकृत भूत → स्थूल अवस्था (दृश्य जगत)
इन्हीं स्थूल महाभूतों से हमारा स्थूल शरीर और सम्पूर्ण भौतिक संसार निर्मित होता है।
Panchi Karan prakriya
पञ्चीकरण प्रक्रिया कैसे होती है
यह पञ्चीकरण प्रक्रिया कैसे सम्पन्न होती है? अत्यन्त व्यवस्थित ढंग से इसके बारे में वेदान्त में लिखा गया है…
“पञ्चीकरण त्वाकाशादिपञ्चस्वेकैकं द्विधा समं विभज्य तेषु दशसु भागेषु प्राथमिकान् पञ्चभागान् प्रत्येकम् चतुर्धा समं विभज्य तेषां चतुर्णां भागानाम् स्व स्व द्वितीयार्ध भागपरित्यागेन भागान्तरेषु संयोजनं।”
अर्थात… आकाश, वायु, तेज,जल तथा पृथ्वी को दो समान भाग में विभाजित कर के, उन दस भागों में से प्रत्येक के आधे भाग को पुनः चार बराबर भागों में विभाजित करके, उनके आधे भाग को छोड़ ,करके उनके चतुर्थ भाग को अन्य में मिलाने की प्रक्रिया पञ्चीकरण है। और इनसे पञ्च महाभूत बनते हैं ।
पञ्चीकरण प्रक्रिया का प्रथम चरण.. “विभाजन “
सर्व प्रथम इन पञ्च महाभूतों में से प्रत्येक को दो-दो भाग में विभक्त कर देते हैं। इस प्रकार ये कुल दस भाग में विभाजित हो जाते हैं। अर्थात..
1/2 आकाश, 1/2 तेज, 1/2 वायु, 1/2जल ,1/2 पृथ्वी
संक्षेप में….
✅ पहला चरण – विभाजन
प्रत्येक तत्त्व (आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी) को
दो बराबर भागों (1/2 , 1/2) में बाँट दिया जाता है।
👉 इस प्रकार कुल मिलाकर 10 भाग बन जाते हैं।
द्वितीय चरण पुनः विभाजन
तत्पश्चात इन विभक्त हुए पांचों के एक-एक भाग अर्थात बचे हुए आधे को पुनः चार चार भाग में विभक्त कर देते हैं। इस प्रकार प्रत्येक भूत पांच भाग में विभाजित हो जाता है… एक भाग आधा तथा दूसरा चार भागों में विभाजित चार भाग। अर्थात..
1/2 +1/8+1/8+1/8+1/8 ….. इसे संक्षेप में समझिये.
✅ दूसरा चरण – पुनः विभाजन
अब प्रत्येक तत्त्व के एक आधे भाग (1/2) को
फिर से चार बराबर भागों (1/8 + 1/8 + 1/8 + 1/8) में विभाजित किया जाता है।
👉 अब हर तत्त्व के पास होता है:
1/2 + चार छोटे भाग (1/8 each)
तृतीय चरण.. प्रत्येक तत्व को आपस में मिलाना
अब प्रत्येक भूत का वह भाग, जो चार भाग विभाजित किया गया है, उस भाग में से एक- एक भाग को एक-एक कर के अन्य चारो महाभूतों में मिला देते हैं। यह इस प्रकार और स्पष्ट हो जाएगा ..
सर्व प्रथम आकाश को दो भागों में विभाजित किया गया, पुनः आधे भाग को चार बराबर भागों में विभाजित किया जाएगा.. तथा विभाजित हुए चार भाग के एक एक भाग को अन्य में मिला दिया जाएगा।इस प्रकार ..
आकाश = 1/2आकाश + 1/8 तेज +1/8वायु +1/8जल +1/8पृथ्वी
यह प्रक्रिया संक्षेप में इस प्रकार है..
✅ तीसरा चरण – आपसी मिश्रण
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है —
👉 हर तत्त्व अपने चार छोटे भागों (1/8) को
बाकी चार तत्त्वों में बाँट देता है।
इससे हर तत्त्व में —
- 1/2 भाग उसका अपना
- 1/8 भाग अन्य चारों तत्त्वों का हो जाता है।
अर्थात किसी भी सूक्ष्म भूत विभाजित हुए चार भाग में से एक भाग आकाश में, एक भाग वायु में, एक भाग तेज में, एक भाग जल में तथा एक भाग पृथ्वी में मिला देते हैं।
इस प्रकार सभी महाभूतों को सभी में मिला देते हैं तब हम देखते हैं कि प्रत्येक महा भूतों में अपना आधा अंश होता है तथा अन्य चार महा भूतों के भी चार अष्टमांश उनमें मिल गये और वे पुनः पूर्ण हो गये तथा ये पांचों महाभूत पांचों के समन्वित रूप हो जाते हैं। अर्थात उनमें आधा गुण स्वयं का तथा आधे में अन्य चारो का गुण होता है।
तदुक्तं.. इसी से सम्बन्धित एक कारिका है..
द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः।
स्व -स्वेतर -द्वितीयांशैर्योजनात्पञ्च-पञ्च ते।।
उदाहरण से समझें
जैसे आकाश का निर्माण इस प्रकार होगा:
आकाश = 1/2 आकाश + 1/8 वायु + 1/8 तेज + 1/8 जल + 1/8 पृथ्वी
👉 इसी प्रकार शेष सभी महाभूत भी बनते हैं।
इस प्रकार पञ्चीकरण प्रक्रिया संपन्न होती है।
जब ये सारे तत्व आपस में मिल जाते हैं तो किस तत्व में किस गुण की प्रधानता मानी जाएगी?
ऐसी स्थिति में प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति के आधार पर जिसमें जिस अंश की अधिकता है, उसमें उस गुण की प्रधानता मानी जानी चाहिये।
पांचों महाभूतों में पांचों के समान भाग मिले होने पर भी प्रत्येक के विशेष आधे अंश के आधार पर ही उनके लिये आकाशादि न्याय संगत व्यवहार होता है।
पञ्चीकरण के पश्चात हर एक महाभूत अपने पहले वाले महाभूत के गुणों को ग्रहण कर लेता है। जैसा की वेदान्त में लिखा गया है..
तदानीमाकाशे शब्दाऽभिव्यञ्जते वायौ शब्दस्पर्शावग्नौ शब्दस्पर्शरूपाण्यप्सु शब्दस्पर्शरूपरसाः पृथिव्यां शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाश्च।।
अर्थात…तभी पञ्चीकृत अवस्था में
- आकाश में शब्द,
- वायु में शब्द स्पर्श,
- अग्नि में शब्द स्पर्श रूप ,
- जल में शब्द स्पर्श रूप रस तथा
- पृथ्वी में शब्द, स्पर्श,रूप,रस तथा गन्ध अभिव्यञ्जित होते हैं।
पञ्चीकरण इस चित्र से और स्पष्ट हो जायेगा…

इति वेदान्त दर्शन के अनुसार पञ्चीकरण प्रक्रिया
प्रश्न-उत्तर..
1 प्रश्न. वेदान्त दर्शन में पंचीकरण क्या है?
उत्तर..सृष्टि के विकास हेतु पञ्च तन्मात्राओं को परस्पर मिलाने की प्रक्रिया पञ्चीकरण प्रक्रिया कही जाती है। आकाश जल तेज वायु पृथ्वी यइन पांच तन्मात्राओं को विभाजित करके परस्पर मिलाने कि प्रक्रिया पंचीकरण है।
2. प्रश्न.. सूक्ष्म तन्मात्राएं कौन-कौन सी हैं?
उत्तर.. आकाश, तेज, जल, वायु, पृथ्वी ये अलग-अलग रहने पर सूक्ष्म तन्मात्राएं कही जाती हैं।
भाग 2: Short Answer Questions
- पञ्चीकरण प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: सूक्ष्म तन्मात्राओं को आपस में मिलाकर स्थूल महाभूत बनाना। - पञ्चीकरण के पश्चात आकाश में कौन सा गुण प्रकट होता है?
उत्तर: शब्द। - स्थूल महाभूत और सूक्ष्म तन्मात्रा में क्या अंतर है?
उत्तर: स्थूल महाभूत पञ्चीकरण के बाद बनते हैं और दृश्य रूप में होते हैं, जबकि सूक्ष्म तन्मात्राएँ अलग रहती हैं और अदृश्य होती हैं। - पञ्चीकरण प्रक्रिया का शास्त्रीय सूत्र क्या है?
उत्तर: द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः। स्व-स्वेतर-द्वितीयांशैर्योजनात् पञ्च-पञ्च ते॥
- पञ्चीकरण के पश्चात प्रत्येक महाभूत में अन्य महाभूतों का अंश क्यों शामिल होता है?
उत्तर: ताकि सभी महाभूत आपस में समन्वित रूप में मिलकर स्थूल सृष्टि का निर्माण कर सकें।
FAQ – पञ्चीकरण प्रक्रिया
Q1. पञ्चीकरण प्रक्रिया क्या है?
A: पञ्चीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें पाँच सूक्ष्म तत्त्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) मिलकर स्थूल महाभूत बनाते हैं।
Q2. स्थूल और सूक्ष्म महाभूत में अंतर क्या है?
A: सूक्ष्म महाभूत (तन्मात्रा) अदृश्य होते हैं और अलग रहते हैं, जबकि स्थूल महाभूत पञ्चीकरण के बाद बनते हैं और दृश्य रूप में होते हैं।
Q3. पञ्चीकरण में कुल कितने चरण होते हैं?
A: तीन चरण – प्रथम विभाजन, द्वितीय विभाजन, और भागों का आपसी मिश्रण।
Q4. प्रत्येक महाभूत में अपने गुण का आधा अंश और अन्य चार महाभूतों का अंश क्यों होता है?
A: ताकि सभी महाभूतों में समान समन्वय बने और स्थूल सृष्टि में उनका संतुलित प्रभाव दिखाई दे।
Q5. पञ्चीकरण के बाद पृथ्वी में कौन-कौन से गुण प्रकट होते हैं?
A: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध।
वेदान्त दर्शन के अनुसार अज्ञान
अनुबन्ध चतुष्टय वेदान्त दर्शन के अनुसार